Thursday, 19 September 2019
काव्य समस्या
अब समय ही कहाँ है के कविता लिखी जाये
अब तो जी वार्ता होती है कार्यालयीन
अब घूम भी जाये जो बात एक बार फिरसे
व्याख्यान भी तो अब सीधे और क्रमिक होते हैं
जलधारा सा तरंगित था जो जीवन
अब समय ही कहाँ है के कविता लिखी जाये
Wednesday, 11 January 2017
आवाजों की #जुगलबंदी
आवाजों में भी एक सफर है..
आवाजों में भी एक कहानी है..
आवाजों का भी किरदार है..
आवाजों में भी एक कहानी है..
आवाजों का भी किरदार है..
गाँव में कहीं दूर से आती हुई इंजन की आवाज
रात में आती झींगुरों की आवाज,
तेज हवा के चलने का रुआब
रात में आती झींगुरों की आवाज,
तेज हवा के चलने का रुआब
पत्थर के पानी में गिरने पर आती एक गहरी चीख
कुँए में अपना खुद का नाम चीख के वापस आती आवाज
पुल से रेल निकलते वक़्त बदल जाने वाली आवाज
कुँए में अपना खुद का नाम चीख के वापस आती आवाज
पुल से रेल निकलते वक़्त बदल जाने वाली आवाज
यामाहा RX 100 के दुसरे गियर वाली आवाज
मम्मी,दादी की अलग से पहचान में आ जाने वाली पायल की आवाज
पिताजी के अखबार को झिड़क के खोलने पर आने वाली कड़क कागज़ी आवाज
मम्मी,दादी की अलग से पहचान में आ जाने वाली पायल की आवाज
पिताजी के अखबार को झिड़क के खोलने पर आने वाली कड़क कागज़ी आवाज
स्टील के ग्लासों को कान पे लगाने पर आने वाली सांय सांय,
बहते पानी का कोलाहल,
सुबह होते ही चिड़ियों के गाने की आवाज
बहते पानी का कोलाहल,
सुबह होते ही चिड़ियों के गाने की आवाज
इंटरवल ख़त्म हो जाने पर बजने वाली घंटी की आवाज..
बड़े दिनोँ से बन्द किसी दरवाजे को खोलने पर आने वाली आवाज..
बोतल से गिलास मेँ दारू डालते वक्त आने वाली आवाज..
बड़े दिनोँ से बन्द किसी दरवाजे को खोलने पर आने वाली आवाज..
बोतल से गिलास मेँ दारू डालते वक्त आने वाली आवाज..
गली के नुक्कड़ से ही पिताजी के स्कूटर के होर्न की पहचान मेँ आ जाने वाली आवाज.
जेब मे खनखते सिक्कोँ की आवाज
कभी-कभी गीली हवाई-चप्पलोँ को पहनकर चलने पर आने वाली आवाज
जेब मे खनखते सिक्कोँ की आवाज
कभी-कभी गीली हवाई-चप्पलोँ को पहनकर चलने पर आने वाली आवाज
स्टोर-रूम मेँ लड़ते चूहोँ की आवाज
गली के फेरी वालोँ की आवाज
खरंजोँ-गड्रडोँ पर साईकिल की घण्टी की खुद ही बजने वाली आवाज
गली के फेरी वालोँ की आवाज
खरंजोँ-गड्रडोँ पर साईकिल की घण्टी की खुद ही बजने वाली आवाज
गाय-भैँस के गले मेँ लटके घण्टी की आवाज
बरसीम काटते वक्त आने वाली आवाज
पानी आने से पहले हैण्डपम्प मेँ आने वाली एयर की आवाज
बरसीम काटते वक्त आने वाली आवाज
पानी आने से पहले हैण्डपम्प मेँ आने वाली एयर की आवाज
वाकई..आवाजोँ मेँ एक सफर होता है
एक कहानी होती है..
और उनके भी किरदार होते हैँ..
एक कहानी होती है..
और उनके भी किरदार होते हैँ..
अनजान
Thursday, 5 January 2017
जाने कौन जन्म का नाता
तुझ से जाने कौन जन्म का नाता,
बहुत सोचा मैं पर समझ न पाता।
कभी माँ बन मेरे सपनों में आवें,
और कभी बेटी बन हुक्म चलावें !
कभी बड़ी बहन बन मेरे आंसूं पोंछें,
कभी छोटी बहना की जिद के झोंके !
और कभी मेरा मकान तू घर बनावें
सांसें मेरी सब सन्दल सी महकाएं !
पर ये तो सब हैं सपनों की बातें
गुपचुप राज़ भरी अपनों की बातें !
राज़ मेरे सब तुझ पर ज़ाहिर,
मुश्किल रु-ब-रु, फिर भी हाज़िर !
सच चाहे मैं हरगिज़ न मानूं,
पर तू जाने है , यह मैं जानूँ !
आस ना कोई, फिर भी ख़ास
नेह की बारिश, नेह की प्यास !
और सच में तू जैसी है, वैसी ही रहना
फिर चाहे मत मुझे अपना कहना !
बस कभी कभी मेरे सपनों में आना
आ कर मुझे तुम अपना बताना !
-- अमर
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बहुत सोचा मैं पर समझ न पाता।
कभी माँ बन मेरे सपनों में आवें,
और कभी बेटी बन हुक्म चलावें !
कभी बड़ी बहन बन मेरे आंसूं पोंछें,
कभी छोटी बहना की जिद के झोंके !
और कभी मेरा मकान तू घर बनावें
सांसें मेरी सब सन्दल सी महकाएं !
पर ये तो सब हैं सपनों की बातें
गुपचुप राज़ भरी अपनों की बातें !
राज़ मेरे सब तुझ पर ज़ाहिर,
मुश्किल रु-ब-रु, फिर भी हाज़िर !
सच चाहे मैं हरगिज़ न मानूं,
पर तू जाने है , यह मैं जानूँ !
आस ना कोई, फिर भी ख़ास
नेह की बारिश, नेह की प्यास !
और सच में तू जैसी है, वैसी ही रहना
फिर चाहे मत मुझे अपना कहना !
बस कभी कभी मेरे सपनों में आना
आ कर मुझे तुम अपना बताना !
-- अमर
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विपरीत मायने
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पुण्य-पाप
दिन-रात,
धूप-छांव,
सांझ-सबेरा,
काया-छाया,
आकाश-पताल,
सुख-दुःख,
मिलना-बिछड़ना,
उल्फत-नफरत,
सफ़ेद-स्याह,
सच-झूठ,
ख़ुशी-ग़म,
हँसना-रोना,
सही-ग़लत,
आबाद-बरबाद,
क़ातिल-मक़तूल,
ये सब.....ऐसे जैसे
तू और मैं !
-- अमर
****************************** ********
ये और वो
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ये सिसकियाँ,वो ठुकराना।
ये हिचकियाँ,वो चले जाना।
ये आदतें, वो आहटें।
ये सदायेँ, वो अदायें।
ये वफ़ायें, वो जफ़ायें।
ये मिन्नतें, वो लानतें।
ये लुट जाना,वो लूट जाना।
ये करम , वो सितम ।
ये प्यार,वो व्यौपार।
ये मैं और वो तू !
-अमर
****************************** ********
क्या कहूँ
क्या कहूँ आप से, लफ्ज़ कम पड़ जातें हैं,
बयां करे ज़ज़्बात तो नयन नम पड़ जातें हैं.
कुछ ऐसी ही किस्मत लिखा के लाया है बंदा, ऐ दोस्त
लिखें "ख़ुशी" जो तो फ़रिश्ते उसे "ग़म" पढ़ जाते हैं।
-अमर
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मैं बेचारा
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परछाइयों का मज़मा था, गुलज़ार नहीं हुआ,
मैं बदबख़्त नाशाद था, आबाद नहीं हुआ.
बेशर्मों ने नंगे हो कर बेचा ख़ुदको, चौक पे,
मेरा ख़रीदार नहीं मिला, मैं शर्मसार ही हुआ.
शाम ढले गुलज़ार हुए कोठे तो हुईं हैरानी,
मेरा तो इक घर था, वो क्यों वीरान ही हुआ.
मैंने कौन सी ऐसी बेज़ा इनायत की मांग की,
क्यों मेरी नहीं सुनी, क्यों मेरा काम नहीं हुआ.
चोट गहरी देस बेगाना, बताते भी तो किस को,
अपने ही कंधे पर रोना, कभी आसान नहीं हुआ .
हाक़िम ने मेरे हिस्से का सूरज भी पी लिया,
आबाद होने आया था मैं, बर्बाद ही हुआ .
-अमर
****************************** **************************
यादें
**********************
यक-ब-यक चलते चलते,
देखा जो पीछे मुड़ के,
कुछ वफायें रो रहीं थी,
कुछ रिश्ते सिसक रहे थे.
कुछ यकीन थे कतरा-कतरा,
कुछ अक़ीदतें पुर्ज़ा-पुर्ज़ा,
कुछ फूल जल रहे थे,
कुछ लम्हें सुलग रहे थे,
कुछ ख़्वाब बिख़र रहे थे,
कुछ वादे पलट रहे थे.
कुछ नामवर से चेहरे,
तेरे नाम में सिमट रहे थे,
कुछ पोशीदा से किस्से,
सड़क पे घिसट रहे थे.
कुछ सितारे थे मध्यम-मध्यम,
कुछ चाँद धुंधले-धुंधले,
थी तिशनगी बे-लिहाज सी,
तेरी अंजुमन में मरते मरते
लगी जो पैर पे ठोकर,
संभला मैं गिरते गिरते,
इक छन्न सी आवाज़ आयी,
कुछ तो जरूर फूटा,
दिल था या अना मेरी,
कुछ तो जरूर टूटा,
खोली जो गठरी ज़हन की ,
मन ही मन में डरते-डरते,
कुछ पाक़ीज़ा सी यादों ने ज़बरदस्ती......
सीली आखों में बसेरा कर लिया।
-- अमर
यक-ब-यक : अचानक
अक़ीदत : श्रद्धा
पोशीदा : गुप्त
तिशनगी : प्यास
अंजुमन : महफ़िल
अना : अहम्
****************************** ***************
यक-ब-यक चलते चलते,
देखा जो पीछे मुड़ के,
कुछ वफायें रो रहीं थी,
कुछ रिश्ते सिसक रहे थे.
कुछ यकीन थे कतरा-कतरा,
कुछ अक़ीदतें पुर्ज़ा-पुर्ज़ा,
कुछ फूल जल रहे थे,
कुछ लम्हें सुलग रहे थे,
कुछ ख़्वाब बिख़र रहे थे,
कुछ वादे पलट रहे थे.
कुछ नामवर से चेहरे,
तेरे नाम में सिमट रहे थे,
कुछ पोशीदा से किस्से,
सड़क पे घिसट रहे थे.
कुछ सितारे थे मध्यम-मध्यम,
कुछ चाँद धुंधले-धुंधले,
थी तिशनगी बे-लिहाज सी,
तेरी अंजुमन में मरते मरते
लगी जो पैर पे ठोकर,
संभला मैं गिरते गिरते,
इक छन्न सी आवाज़ आयी,
कुछ तो जरूर फूटा,
दिल था या अना मेरी,
कुछ तो जरूर टूटा,
खोली जो गठरी ज़हन की ,
मन ही मन में डरते-डरते,
कुछ पाक़ीज़ा सी यादों ने ज़बरदस्ती......
सीली आखों में बसेरा कर लिया।
-- अमर
यक-ब-यक : अचानक
अक़ीदत : श्रद्धा
पोशीदा : गुप्त
तिशनगी : प्यास
अंजुमन : महफ़िल
अना : अहम्
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मिलना
मिलना छोड़ दिया उन सब से, जो किसी मतलब से मिलते थे,
उन्हें हम आज भी मिलते हैं, जिन्हें बस ! मिलने से मतलब है.
-अमर
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अब की बार
अब की बार तो हुस्न-ऐ-यार ने कमाल कर दिया,
ऐसा दिया ज़वाब के ला-ज़वाब कर दिया।
ख़ुद तो शाइस्ता है चौहदवीं के चाँद के मानिंद,
ऐसी लगाई आग के मुझे सूरज-मिसाल कर दिया।
इक वक्त था के खुश करता था मुस्कुरा के देख कर,
कर कर के नज़रअंदाज़ इस बार तो निहाल कर दिया।
क्या सलीके से डसा इस बार तो मेरे यार ने मुझे,
हक़ीक़त को मेरी पल में ख़्वार-ओ-ख़्वार कर दिया।
दीवाने से दीवाने के जीने की वजह ही छीन ली,
मरना तो मुश्किल था ही, जीना भी बवाल कर दिया।
-अमर
वो दिलबर
वो दिलबर जो दिल में बसा है, यूं समझिये ! थोड़ा सा बदगुमां है,
पर उस के बिना गुज़र भी कहाँ, उस जैसा दूजा कोई और कहाँ है।
रूठना-मनाना, फिर रूठना-फिर मनाना, फिर से रूठ जाना,
ये मुहब्बत की अजब सी वहशत उस के और मेरे दरमियाँ है।
इक इबादत ख़त्म, एक अलामत शुरू, ये कतार लंबी लगती है,
महबूब जाने या ख़ुदा जाने, ये कहां से कहां तक का सिलसिला है।
साथ चल रहे हैं दोनों के लम्हा-दर-लम्हा बस उम्र कट रही सारी,
यूं तो वही है रस्ता, वही हवा, वही फ़िज़ा, सब वैसे ही ग़मज़दा है।
-अमर
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राम करे !
राम करे !
परवरदिगार तुझ पर सदा मेहरबान रहे,
राम करे !
सब रूहें तेरी सोहबत की कद्रदान रहें ।
राम करे !
आँख तेरी कभी ना बरसे, ना झुके ,
राम करे !
तेरी खुशियों का खज़ाना कभी न चुके।
राम करे !
तेरे लफ़्ज़ सदा अपना जादू जगाते रहें,
राम करे !
सुनने वालों को तिलिस्म दिखाते रहें।
राम करे !
तू सारी दुनिया में मक़बूल हो जाये,
राम करे !
मेरी ये दुआ क़ुबूल हो जाये।
-- अमर
****************************** *************
Sunday, 15 May 2016
बदनाम लड़कियां
कुछ बदनाम लड़कियां
जब मोहल्ले से चली जाती हैं काम पर
शरीफ लोग
तेज-तेज साँस लेते हैं....
शरीफ लड़कियां
मुंह ढककर चली आती हैं किसी चौराहे पर
जहाँ शरीफ लड़के उसका इंतज़ार करते हैं
लड़कियों को बैठ जाना होता है
बाइक के पिछली सीट पर
या लड़के खुद हाथ पकड़कर
उन्हें पार्क घुमा लाते हैं....
मुंह ढककर चली आती हैं किसी चौराहे पर
जहाँ शरीफ लड़के उसका इंतज़ार करते हैं
लड़कियों को बैठ जाना होता है
बाइक के पिछली सीट पर
या लड़के खुद हाथ पकड़कर
उन्हें पार्क घुमा लाते हैं....
बदनाम लड़कियां लौटती है देर रात
ट्रैफिक पुलिस को गाली बकते हुए
तब तक शरीफ लड़कियां सो चुकी होती हैं
माँ-बाप का पैर छू कर
रात के तीसरे प्रहर में
शरीफ लड़कियों का मोबाइल घनघना उठता है....
ट्रैफिक पुलिस को गाली बकते हुए
तब तक शरीफ लड़कियां सो चुकी होती हैं
माँ-बाप का पैर छू कर
रात के तीसरे प्रहर में
शरीफ लड़कियों का मोबाइल घनघना उठता है....
तब बदनाम लड़कियां
पिला रही होती है बूढी माँ को पानी
बाप से बतिया रही होती है पेशन के लफड़े पर
छोटे भाई के पर्स में डाल रही होती है पैसे
सूखे पौधों पर तरस खाकर डाल देती है ढेर सारा पानी
बदनाम लड़कियां जब सोती हैं
बेहोश होती हैं ..
पिला रही होती है बूढी माँ को पानी
बाप से बतिया रही होती है पेशन के लफड़े पर
छोटे भाई के पर्स में डाल रही होती है पैसे
सूखे पौधों पर तरस खाकर डाल देती है ढेर सारा पानी
बदनाम लड़कियां जब सोती हैं
बेहोश होती हैं ..
मोहल्ले के शरीफ लोग
डरते हैं बदनाम लड़कियों से
इसलिए वो छुपकर देखते हैं उन्हें
खिडकियों से झांकक..
डरते हैं बदनाम लड़कियों से
इसलिए वो छुपकर देखते हैं उन्हें
खिडकियों से झांकक..
अचानक सपने में देख लेती है वो घूरती हुए कुछ आँखें
उठकर देती है गालियाँ और बंद कर देती है खिड़की..
उठकर देती है गालियाँ और बंद कर देती है खिड़की..
शरीफ लोग इन गालियों से बहुत डरते हैं
इन्हें पसंद है शरीफ लड़कियां
जो मुस्कुराकर उन्हें हाय बोलती हैं
इन्हीं शरीफ लड़कियों को जब पता चल जाती है
उनकी शराफत
शरीफ लड़कियां बदनाम होती हैं....
इन्हें पसंद है शरीफ लड़कियां
जो मुस्कुराकर उन्हें हाय बोलती हैं
इन्हीं शरीफ लड़कियों को जब पता चल जाती है
उनकी शराफत
शरीफ लड़कियां बदनाम होती हैं....
और ये लोग शरीफ के शरीफ रह जाते हैं
मैं शरीफों के मोहल्ले से बहुत डरती हूँ
क्योंकि वहां मेरी बेटी का बदनाम होना तय है..
मैं शरीफों के मोहल्ले से बहुत डरती हूँ
क्योंकि वहां मेरी बेटी का बदनाम होना तय है..
उसकी माँ ने दे दी है हिदायत
अंकल से दूर रहना बेटा
बेटियां समझने लगी हैं अपने कच्ची उम्र से ही ये बातें
इन दिनों उनकी आँखों में भी एक डर देखती हूँ मैं.....!!
अंकल से दूर रहना बेटा
बेटियां समझने लगी हैं अपने कच्ची उम्र से ही ये बातें
इन दिनों उनकी आँखों में भी एक डर देखती हूँ मैं.....!!
साभार - Aditi Gupta
Wednesday, 31 December 2014
जिंदगी के सफ़र में
जिंदगी के सफ़र में एक दिन मै कफ़न में सिल जाउंगी
तब गुनगुना लेना गीत मेरे मै अल्फाज में मिल जाउंगी
लफ़्ज़ों से गर फूटे लावा तो तुम बिलकुल ना घबराना
सुलगती चिंगारियों से तुम तब अपनी जीभ को नहलाना
तब अंगारे बन कर फुटूगी जब आग को दे दिल जाउंगी
तब गुनगुना लेना गीत मेरे मै अल्फाज में मिल जाउंगी
लाल किले पर जब एक शख्स हर साल यूं ही बहकायेगा
किसान का बेटा फिर यूँ ही दर- दर की ठोकरें खायेगा
फिर हिला लेना जुबान अपनी मै भी संग हिल जाऊगी
तब गुनगुना लेना गीत मेरे मै अल्फाज में मिल जाउंगी
जब रोटी चाँद सी लगने लगे तब ये सिर उठा लेना
पेट पे बांधकर मोटी रस्सी और लाठी फिर उठा लेना
और छील देना व्यवस्था को मै भी संग छिल जाउंगी
तब गुनगुना लेना गीत मेरे मै अल्फाज में मिल जाउंगी
नौजवान खो गया है अब शराब के खुले आहतों में
सोने की चिड़िया कैद हुई वेदेशी बैंको के खातों में
घोटालों का हिसाब नहीं मै भी बिन रसीद बिल जाउंगी
तब गुनगुना लेना गीत मेरे मै अल्फाज में मिल जाउंगी
सोने की चिड़िया ले आओ तब ही कुछ हो पायेगा
चाहकर भी कोई मजदूर फिर भूखा न सो पायेगा
मै भी किसी गरीब के महल में फूल बन खिल जाउंगी
गुनगुना लेना गीत मेरे मै अल्फाजों में मिल जाउंगी
जिंदगी के सफ़र में एक दिन मै कफ़न में सिल जाउंगी
तब गुनगुना लेना गीत मेरे मै अल्फाज में मिल जाउंगी
-- Aditi Gupta
तब गुनगुना लेना गीत मेरे मै अल्फाज में मिल जाउंगी
लफ़्ज़ों से गर फूटे लावा तो तुम बिलकुल ना घबराना
सुलगती चिंगारियों से तुम तब अपनी जीभ को नहलाना
तब अंगारे बन कर फुटूगी जब आग को दे दिल जाउंगी
तब गुनगुना लेना गीत मेरे मै अल्फाज में मिल जाउंगी
लाल किले पर जब एक शख्स हर साल यूं ही बहकायेगा
किसान का बेटा फिर यूँ ही दर- दर की ठोकरें खायेगा
फिर हिला लेना जुबान अपनी मै भी संग हिल जाऊगी
तब गुनगुना लेना गीत मेरे मै अल्फाज में मिल जाउंगी
जब रोटी चाँद सी लगने लगे तब ये सिर उठा लेना
पेट पे बांधकर मोटी रस्सी और लाठी फिर उठा लेना
और छील देना व्यवस्था को मै भी संग छिल जाउंगी
तब गुनगुना लेना गीत मेरे मै अल्फाज में मिल जाउंगी
नौजवान खो गया है अब शराब के खुले आहतों में
सोने की चिड़िया कैद हुई वेदेशी बैंको के खातों में
घोटालों का हिसाब नहीं मै भी बिन रसीद बिल जाउंगी
तब गुनगुना लेना गीत मेरे मै अल्फाज में मिल जाउंगी
सोने की चिड़िया ले आओ तब ही कुछ हो पायेगा
चाहकर भी कोई मजदूर फिर भूखा न सो पायेगा
मै भी किसी गरीब के महल में फूल बन खिल जाउंगी
गुनगुना लेना गीत मेरे मै अल्फाजों में मिल जाउंगी
जिंदगी के सफ़र में एक दिन मै कफ़न में सिल जाउंगी
तब गुनगुना लेना गीत मेरे मै अल्फाज में मिल जाउंगी
-- Aditi Gupta
Sunday, 2 March 2014
Sunday, 23 February 2014
पंजाबी छन्द १
वेख फरीदा मिटटी खुल्ली,मिटटी उत्ते मिटटी धुल्ली
मिटटी हँसे मिटटी रोवे,अंत मिटटी दा मिटटी होवे
ना कर बन्देया मेरी मेरी,ना ए तेरी ना ए मेरी
चार दिन दा मेला दुनिया, फेर मिटटी ते मिटटी दी ढेरी
~बाबा फरीद
चढ़दे सूरज ढल्दे वेखे, बुझे दिवे बल्दे वेखे
हीरे दा कोई मुल ना तारे, खोटे सिक्के चलदे वेखे
जीना दा ना जग ते कोई, ओ वि पुत्रर पलदे वेखे
ओहदी रहमत दे नाल , बन्दे पानी उत्ते चलदे वेखे
लोकी कहेंदे दाल ना गल्दी,मै ते पत्थर गल्दे वेखे
~ बुल्ले शाह जी.
मिटटी हँसे मिटटी रोवे,अंत मिटटी दा मिटटी होवे
ना कर बन्देया मेरी मेरी,ना ए तेरी ना ए मेरी
चार दिन दा मेला दुनिया, फेर मिटटी ते मिटटी दी ढेरी
~बाबा फरीद
चढ़दे सूरज ढल्दे वेखे, बुझे दिवे बल्दे वेखे
हीरे दा कोई मुल ना तारे, खोटे सिक्के चलदे वेखे
जीना दा ना जग ते कोई, ओ वि पुत्रर पलदे वेखे
ओहदी रहमत दे नाल , बन्दे पानी उत्ते चलदे वेखे
लोकी कहेंदे दाल ना गल्दी,मै ते पत्थर गल्दे वेखे
~ बुल्ले शाह जी.
Saturday, 22 February 2014
देश क्या है ????
बलात्कार से सहमी लड़कियों की चीख़ है?
मंदिर, मस्ज़िद, गुरूद्वारे में बँट रही भीख़ है?
लद्दाख में ठिठुरता जवान है, या,
कश्मीर मांगता हुआ हिन्दू - मुस्लमान है?
सिनेमा में तालियां बजाने वाली मासूमियत है?
किताबों में बेची गई झूठी हक़ीक़त है?
जन गण मन पर झूमता हुआ जन समूह है, या,
व्यवस्था में कुचली गयी बेबस रूह है?
Train में मूँगफली फेंककर
अमरीका की सफ़ाई पर चर्चा करना देश है?
सब कुछ देखकर आँखें बंद कर लेना देश है?
अपने परिवार का पेट पालना देश है, या,
देश पर बैठकर घंटो विचार करना देश है?
देश तुम हो, देश मैं हूँ, देश हम हैं
देश परिभाषाओं की जागीर नहीं,
देश इंसानियत सँभालने का ढाँचा है
देश तुम हो, देश मैं हूँ, देश हम हैं
मंदिर, मस्ज़िद, गुरूद्वारे में बँट रही भीख़ है?
लद्दाख में ठिठुरता जवान है, या,
कश्मीर मांगता हुआ हिन्दू - मुस्लमान है?
सिनेमा में तालियां बजाने वाली मासूमियत है?
किताबों में बेची गई झूठी हक़ीक़त है?
जन गण मन पर झूमता हुआ जन समूह है, या,
व्यवस्था में कुचली गयी बेबस रूह है?
Train में मूँगफली फेंककर
अमरीका की सफ़ाई पर चर्चा करना देश है?
सब कुछ देखकर आँखें बंद कर लेना देश है?
अपने परिवार का पेट पालना देश है, या,
देश पर बैठकर घंटो विचार करना देश है?
देश तुम हो, देश मैं हूँ, देश हम हैं
देश परिभाषाओं की जागीर नहीं,
देश इंसानियत सँभालने का ढाँचा है
देश तुम हो, देश मैं हूँ, देश हम हैं
अज्ञात
Sunday, 29 December 2013
Answer to Munnavar Rana
lines of "Munnavar Rana" about the deep pain of Muslims who left India & moved to Pakistan in the 1947 partition.
मुहाजिर हैं मगर हम एक दुनिया छोड़ आए हैं,
तुम्हारे पास जितना है हम उतना छोड़ आए हैं ।
कहानी का ये हिस्सा आज तक सब से छुपाया है,
कि हम मिट्टी की ख़ातिर अपना सोना छोड़ आए हैं ।
नई दुनिया बसा लेने की इक कमज़ोर चाहत में,
पुराने घर की दहलीज़ों को सूना छोड़ आए हैं ।
अक़ीदत से कलाई पर जो इक बच्ची ने बाँधी थी,
वो राखी छोड़ आए हैं वो रिश्ता छोड़ आए हैं ।
किसी की आरज़ू के पाँवों में ज़ंजीर डाली थी,
किसी की ऊन की तीली में फंदा छोड़ आए हैं ।
पकाकर रोटियाँ रखती थी माँ जिसमें सलीक़े से,
निकलते वक़्त वो रोटी की डलिया छोड़ आए हैं ।
जो इक पतली सड़क उन्नाव से मोहान जाती है,
वहीं हसरत के ख़्वाबों को भटकता छोड़ आए हैं ।
यक़ीं आता नहीं, लगता है कच्ची नींद में शायद,
हम अपना घर गली अपना मोहल्ला छोड़ आए हैं ।
हमारे लौट आने की दुआएँ करता रहता है,
हम अपनी छत पे जो चिड़ियों का जत्था छोड़ आए हैं ।
हमें हिजरत की इस अन्धी गुफ़ा में याद आता है,
अजन्ता छोड़ आए हैं एलोरा छोड़ आए हैं ।
सभी त्योहार मिलजुल कर मनाते थे वहाँ जब थे,
दिवाली छोड़ आए हैं दशहरा छोड़ आए हैं ।
हमें सूरज की किरनें इस लिए तक़लीफ़ देती हैं,
अवध की शाम काशी का सवेरा छोड़ आए हैं ।
गले मिलती हुई नदियाँ गले मिलते हुए मज़हब,
इलाहाबाद में कैसा नज़ारा छोड़ आए हैं ।
हम अपने साथ तस्वीरें तो ले आए हैं शादी की,
किसी शायर ने लिक्खा था जो सेहरा छोड़ आए हैं ।
कई आँखें अभी तक ये शिकायत करती रहती हैं,
के हम बहते हुए काजल का दरिया छोड़ आए हैं ।
शक्कर इस जिस्म से खिलवाड़ करना कैसे छोड़ेगी,
के हम जामुन के पेड़ों को अकेला छोड़ आए हैं ।
वो बरगद जिसके पेड़ों से महक आती थी फूलों की,
उसी बरगद में एक हरियल का जोड़ा छोड़ आए हैं ।
अभी तक बारिसों में भीगते ही याद आता है,
के छप्पर के नीचे अपना छाता छोड़ आए हैं ।
भतीजी अब सलीके से दुपट्टा ओढ़ती होगी,
वही झूले में हम जिसको हुमड़ता छोड़ आए हैं ।
ये हिजरत तो नहीं थी बुजदिली शायद हमारी थी,
के हम बिस्तर में एक हड्डी का ढाचा छोड़ आए हैं ।
हमारी अहलिया तो आ गयी माँ छुट गए आखिर,
के हम पीतल उठा लाये हैं सोना छोड़ आए हैं ।
महीनो तक तो अम्मी ख्वाब में भी बुदबुदाती थीं,
सुखाने के लिए छत पर पुदीना छोड़ आए हैं ।
वजारत भी हमारे वास्ते कम मर्तबा होगी,
हम अपनी माँ के हाथों में निवाला छोड़ आए हैं ।
यहाँ आते हुए हर कीमती सामान ले आए,
मगर इकबाल का लिखा तराना छोड़ आए हैं ।
हिमालय से निकलती हर नदी आवाज़ देती थी,
मियां आओ वजू कर लो ये जूमला छोड़ आए हैं ।
वजू करने को जब भी बैठते हैं याद आता है,
के हम जल्दी में जमुना का किनारा छोड़ आए हैं ।
उतार आये मुरव्वत और रवादारी का हर चोला,
जो एक साधू ने पहनाई थी माला छोड़ आए हैं ।
जनाबे मीर का दीवान तो हम साथ ले आये,
मगर हम मीर के माथे का कश्का छोड़ आए हैं ।
उधर का कोई मिल जाए इधर तो हम यही पूछें,
हम आँखे छोड़ आये हैं के चश्मा छोड़ आए हैं ।
हमारी रिश्तेदारी तो नहीं थी हाँ ताल्लुक था,
जो लक्ष्मी छोड़ आये हैं जो दुर्गा छोड़ आए हैं ।
गले मिलती हुई नदियाँ गले मिलते हुए मज़हब,
इलाहाबाद में कैसा नाज़ारा छोड़ आए हैं ।
कल एक अमरुद वाले से ये कहना गया हमको,
जहां से आये हैं हम इसकी बगिया छोड़ आए हैं ।
वो हैरत से हमे तकता रहा कुछ देर फिर बोला,
वो संगम का इलाका छुट गया या छोड़ आए हैं ।
अभी हम सोच में गुम थे के उससे क्या कहा जाए,
हमारे आन्सुयों ने राज खोला छोड़ आए हैं ।
मुहर्रम में हमारा लखनऊ इरान लगता था,
मदद मौला हुसैनाबाद रोता छोड़ आए हैं ।
जो एक पतली सड़क उन्नाव से मोहान जाती है,
वहीँ हसरत के ख्वाबों को भटकता छोड़ आए हैं ।
महल से दूर बरगद के तलए मवान के खातिर,
थके हारे हुए गौतम को बैठा छोड़ आए हैं ।
तसल्ली को कोई कागज़ भी चिपका नहीं पाए,
चरागे दिल का शीशा यूँ ही चटखा छोड़ आए हैं ।
सड़क भी शेरशाही आ गयी तकसीम के जद मे,
तुझे करके हिन्दुस्तान छोटा छोड़ आए हैं ।
हसीं आती है अपनी अदाकारी पर खुद हमको,
बने फिरते हैं युसूफ और जुलेखा छोड़ आए हैं ।
गुजरते वक़्त बाज़ारों में अब भी याद आता है,
किसी को उसके कमरे में संवरता छोड़ आए हैं ।
हमारा रास्ता तकते हुए पथरा गयी होंगी,
वो आँखे जिनको हम खिड़की पे रखा छोड़ आए हैं ।
तू हमसे चाँद इतनी बेरुखी से बात करता है
हम अपनी झील में एक चाँद उतरा छोड़ आए हैं ।
ये दो कमरों का घर और ये सुलगती जिंदगी अपनी,
वहां इतना बड़ा नौकर का कमरा छोड़ आए हैं ।
हमे मरने से पहले सबको ये ताकीद करना है ,
किसी को मत बता देना कि क्या-क्या छोड़ आए हैं ।
******************************
मुहाजिर हैं मगर हम एक दुनिया छोड़ आए हैं,
तुम्हारे पास जितना है हम उतना छोड़ आए हैं ।
कहानी का ये हिस्सा आज तक सब से छुपाया है,
कि हम मिट्टी की ख़ातिर अपना सोना छोड़ आए हैं ।
नई दुनिया बसा लेने की इक कमज़ोर चाहत में,
पुराने घर की दहलीज़ों को सूना छोड़ आए हैं ।
अक़ीदत से कलाई पर जो इक बच्ची ने बाँधी थी,
वो राखी छोड़ आए हैं वो रिश्ता छोड़ आए हैं ।
किसी की आरज़ू के पाँवों में ज़ंजीर डाली थी,
किसी की ऊन की तीली में फंदा छोड़ आए हैं ।
पकाकर रोटियाँ रखती थी माँ जिसमें सलीक़े से,
निकलते वक़्त वो रोटी की डलिया छोड़ आए हैं ।
जो इक पतली सड़क उन्नाव से मोहान जाती है,
वहीं हसरत के ख़्वाबों को भटकता छोड़ आए हैं ।
यक़ीं आता नहीं, लगता है कच्ची नींद में शायद,
हम अपना घर गली अपना मोहल्ला छोड़ आए हैं ।
हमारे लौट आने की दुआएँ करता रहता है,
हम अपनी छत पे जो चिड़ियों का जत्था छोड़ आए हैं ।
हमें हिजरत की इस अन्धी गुफ़ा में याद आता है,
अजन्ता छोड़ आए हैं एलोरा छोड़ आए हैं ।
सभी त्योहार मिलजुल कर मनाते थे वहाँ जब थे,
दिवाली छोड़ आए हैं दशहरा छोड़ आए हैं ।
हमें सूरज की किरनें इस लिए तक़लीफ़ देती हैं,
अवध की शाम काशी का सवेरा छोड़ आए हैं ।
गले मिलती हुई नदियाँ गले मिलते हुए मज़हब,
इलाहाबाद में कैसा नज़ारा छोड़ आए हैं ।
हम अपने साथ तस्वीरें तो ले आए हैं शादी की,
किसी शायर ने लिक्खा था जो सेहरा छोड़ आए हैं ।
कई आँखें अभी तक ये शिकायत करती रहती हैं,
के हम बहते हुए काजल का दरिया छोड़ आए हैं ।
शक्कर इस जिस्म से खिलवाड़ करना कैसे छोड़ेगी,
के हम जामुन के पेड़ों को अकेला छोड़ आए हैं ।
वो बरगद जिसके पेड़ों से महक आती थी फूलों की,
उसी बरगद में एक हरियल का जोड़ा छोड़ आए हैं ।
अभी तक बारिसों में भीगते ही याद आता है,
के छप्पर के नीचे अपना छाता छोड़ आए हैं ।
भतीजी अब सलीके से दुपट्टा ओढ़ती होगी,
वही झूले में हम जिसको हुमड़ता छोड़ आए हैं ।
ये हिजरत तो नहीं थी बुजदिली शायद हमारी थी,
के हम बिस्तर में एक हड्डी का ढाचा छोड़ आए हैं ।
हमारी अहलिया तो आ गयी माँ छुट गए आखिर,
के हम पीतल उठा लाये हैं सोना छोड़ आए हैं ।
महीनो तक तो अम्मी ख्वाब में भी बुदबुदाती थीं,
सुखाने के लिए छत पर पुदीना छोड़ आए हैं ।
वजारत भी हमारे वास्ते कम मर्तबा होगी,
हम अपनी माँ के हाथों में निवाला छोड़ आए हैं ।
यहाँ आते हुए हर कीमती सामान ले आए,
मगर इकबाल का लिखा तराना छोड़ आए हैं ।
हिमालय से निकलती हर नदी आवाज़ देती थी,
मियां आओ वजू कर लो ये जूमला छोड़ आए हैं ।
वजू करने को जब भी बैठते हैं याद आता है,
के हम जल्दी में जमुना का किनारा छोड़ आए हैं ।
उतार आये मुरव्वत और रवादारी का हर चोला,
जो एक साधू ने पहनाई थी माला छोड़ आए हैं ।
जनाबे मीर का दीवान तो हम साथ ले आये,
मगर हम मीर के माथे का कश्का छोड़ आए हैं ।
उधर का कोई मिल जाए इधर तो हम यही पूछें,
हम आँखे छोड़ आये हैं के चश्मा छोड़ आए हैं ।
हमारी रिश्तेदारी तो नहीं थी हाँ ताल्लुक था,
जो लक्ष्मी छोड़ आये हैं जो दुर्गा छोड़ आए हैं ।
गले मिलती हुई नदियाँ गले मिलते हुए मज़हब,
इलाहाबाद में कैसा नाज़ारा छोड़ आए हैं ।
कल एक अमरुद वाले से ये कहना गया हमको,
जहां से आये हैं हम इसकी बगिया छोड़ आए हैं ।
वो हैरत से हमे तकता रहा कुछ देर फिर बोला,
वो संगम का इलाका छुट गया या छोड़ आए हैं ।
अभी हम सोच में गुम थे के उससे क्या कहा जाए,
हमारे आन्सुयों ने राज खोला छोड़ आए हैं ।
मुहर्रम में हमारा लखनऊ इरान लगता था,
मदद मौला हुसैनाबाद रोता छोड़ आए हैं ।
जो एक पतली सड़क उन्नाव से मोहान जाती है,
वहीँ हसरत के ख्वाबों को भटकता छोड़ आए हैं ।
महल से दूर बरगद के तलए मवान के खातिर,
थके हारे हुए गौतम को बैठा छोड़ आए हैं ।
तसल्ली को कोई कागज़ भी चिपका नहीं पाए,
चरागे दिल का शीशा यूँ ही चटखा छोड़ आए हैं ।
सड़क भी शेरशाही आ गयी तकसीम के जद मे,
तुझे करके हिन्दुस्तान छोटा छोड़ आए हैं ।
हसीं आती है अपनी अदाकारी पर खुद हमको,
बने फिरते हैं युसूफ और जुलेखा छोड़ आए हैं ।
गुजरते वक़्त बाज़ारों में अब भी याद आता है,
किसी को उसके कमरे में संवरता छोड़ आए हैं ।
हमारा रास्ता तकते हुए पथरा गयी होंगी,
वो आँखे जिनको हम खिड़की पे रखा छोड़ आए हैं ।
तू हमसे चाँद इतनी बेरुखी से बात करता है
हम अपनी झील में एक चाँद उतरा छोड़ आए हैं ।
ये दो कमरों का घर और ये सुलगती जिंदगी अपनी,
वहां इतना बड़ा नौकर का कमरा छोड़ आए हैं ।
हमे मरने से पहले सबको ये ताकीद करना है ,
किसी को मत बता देना कि क्या-क्या छोड़ आए हैं ।
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नहीं जनाब आप जन्नत की चाहत में
मुल्क की छाती पे सदा सड़ता हुआ घाव छोड़ आए हैं
अब क्यों रोते हैं जो जहन्नुम को रहते हैं
जो सच में जन्नत था उसे तो तोड़ आए हैं
आंखी
Thursday, 15 August 2013
उस दिन
मंदिर की सीढियों पर एक भी भूखा, जिस दिन मेरी राह ना रोकेगा,
१५ अगस्त के दिन कोई बच्चा जब ट्राफिक सिग्नल पे तिरंगे ना बेचेगा,
उस दिन स्वतंत्रता-दिवस मैं मनाउं
सिटी-बस में ”महिला आरक्षित” सीट पे मैं जिस दिन बेठुंगी ,
जेवर लदी रात को घर सुरक्षित मैं जिस दिन लौटूंगी,
उस दिन स्वतंत्रता-दिवस मैं मनाउं
मेरा सरकारी काम जिस दिन बिना खिलाये निबट जायेगा ,
कोर्ट-केस अगर जो मेरे जीते-जी सुलझ जायेगा ,
उस दिन स्वतंत्रता-दिवस मैं मनाउं
सारे न्यूज़ चैनल जिस दिन अतिशियुक्त खबरें ना सुनायेंगे ,
उ .प. , बिहार जिस दिन बिना दहेज़ बेटी बिहायेंगे,
उस दिन स्वतंत्रता-दिवस मैं मनाउं
कागज़ पर जिस दिन हर अंगूठा हस्ताक्षर करेगा,
फंसी की सजा से जिस दिन हर बलात्कारी डरेगा,
उस दिन स्वतंत्रता-दिवस मैं मनाउं
सारे रिश्वतखोर जिस दिन सस्पेंड किये जायेंगे ,
मंत्री बनने के लिए जिस दिन एंट्रेंस ऐक्साम लिए जायेंगे ,
उस दिन स्वतंत्रता-दिवस मैं मनाउं
अमरीका के लोग जिस दिन पैसा कमाने भारत आएंगे ,
नासा से भारतीय वैज्ञानिक जिस दिन वापस बुलाये जायेंगे ,
उस दिन स्वतंत्रता-दिवस मैं मनाउं
शिक्षा के नाम पे कोई छात्र ना जिस दिन स्यूसाइड करेगा ,
अमर सैनिक की विधवा को जिस दिन नियमित भत्ता मिलेगा ,
उस दिन स्वतंत्रता-दिवस मैं मनाउं
आतंकवाद से जिस दिन ना मैं घबरऊं
कश्मीर की वादियों में निर्भय जिस दिन घूम आउं,
उस दिन स्वतंत्रता-दिवस मैं ..
DHANISHTHA
१५ अगस्त के दिन कोई बच्चा जब ट्राफिक सिग्नल पे तिरंगे ना बेचेगा,
उस दिन स्वतंत्रता-दिवस मैं मनाउं
सिटी-बस में ”महिला आरक्षित” सीट पे मैं जिस दिन बेठुंगी ,
जेवर लदी रात को घर सुरक्षित मैं जिस दिन लौटूंगी,
उस दिन स्वतंत्रता-दिवस मैं मनाउं
मेरा सरकारी काम जिस दिन बिना खिलाये निबट जायेगा ,
कोर्ट-केस अगर जो मेरे जीते-जी सुलझ जायेगा ,
उस दिन स्वतंत्रता-दिवस मैं मनाउं
सारे न्यूज़ चैनल जिस दिन अतिशियुक्त खबरें ना सुनायेंगे ,
उ .प. , बिहार जिस दिन बिना दहेज़ बेटी बिहायेंगे,
उस दिन स्वतंत्रता-दिवस मैं मनाउं
कागज़ पर जिस दिन हर अंगूठा हस्ताक्षर करेगा,
फंसी की सजा से जिस दिन हर बलात्कारी डरेगा,
उस दिन स्वतंत्रता-दिवस मैं मनाउं
सारे रिश्वतखोर जिस दिन सस्पेंड किये जायेंगे ,
मंत्री बनने के लिए जिस दिन एंट्रेंस ऐक्साम लिए जायेंगे ,
उस दिन स्वतंत्रता-दिवस मैं मनाउं
अमरीका के लोग जिस दिन पैसा कमाने भारत आएंगे ,
नासा से भारतीय वैज्ञानिक जिस दिन वापस बुलाये जायेंगे ,
उस दिन स्वतंत्रता-दिवस मैं मनाउं
शिक्षा के नाम पे कोई छात्र ना जिस दिन स्यूसाइड करेगा ,
अमर सैनिक की विधवा को जिस दिन नियमित भत्ता मिलेगा ,
उस दिन स्वतंत्रता-दिवस मैं मनाउं
आतंकवाद से जिस दिन ना मैं घबरऊं
कश्मीर की वादियों में निर्भय जिस दिन घूम आउं,
उस दिन स्वतंत्रता-दिवस मैं ..
DHANISHTHA
साबरमती के सन्त के अनोखे कमाल
दे दी हमें बरबादी चली कैसी चतुर चाल?
साबरमती के सन्त तूने कर दीया कमाल.
उन्नीस सौ इक्कीस में असहयोग का फरमान,
गान्धी ने कीया जारी तो िहन्दू औ मुसलमान.
घर से नीकल पड़े थे हथेली पे लीये जान,
बाइस में चौरीचौरा में भड़के कई कीसान.
थाने को दीया फूँक तो गान्धी हुए बेहाल,
साबरमती के सन्त तूने कर दीया कमाल.
गान्धी ने कीया रद्द असहयोग का ऐलान,
यह देख भड़क उट्ठे कई लाख नौजवान,
बीस्मील ने लीखा इसपे-ये कैसा है महात्मा!
अंग्रेजों से डरती है सदा जीसकी आत्मा.
नीकला जो इश्तहार वो सचमुच था बेमीसाल,
साबरमती के सन्त तूने कर दीया कमाल.
पैसे की जरूरत थी बड़े काम के लीये,
लोगों की जरूरत थी इन्तजाम के लीये,
बीस्मील ने नौजवान इकट्ठे कई कीये,
छप्पन जीलों में संगठक तैनात कर दीये.
फीर लूट लीया एक दीन सरकार का ही माल,
साबरमती के सन्त तूने कर दीया कमाल.
चालीस गीरफ्तार हुए जेल में गये,
कुछ भेदीये भी बन के इसी खेल में गये,
पेशी हुई तो जज से कहा मेल में गये,
हम भी हुजूर चढ़ के उसी रेल में गये.
उनमें बनारसी भी था गान्धी का यक दलाल,
साबरमती के सन्त तूने कर दीया कमाल.
उसने कीया अप्रूव ये सरकारी खजाना,
बीस्मील ने ही लूटा है वो डाकू है पुराना,
गर छोड़ दीया उसको तो रोयेगा ज़माना,
फाँसी लगा के ख़त्म करो उसका फ़साना.
वरना वो मचायेगा दुबारा वही बबाल.
साबरमती के सन्त तूने कर दीया कमाल.
बीस्मील के साथ तीन और दार पर चढ़े,
जज्वा ये उनका देख नौजवान सब बढे,
सांडर्सका वध करके भगत सींह नीकल पड़े,
बम फोड़ने असेम्बली की ओर चल पड़े.
बम फोड़ के पर्चों को हवा में दीया उछाल.
साबरमती के सन्त तूने कर दीया कमाल.
इस सबकी सजा मौत भगत सींह को मीली,
जनता ने बहुत चाहा पे फाँसी नहीं टली,
इरवीन से हुआ पैक्ट तो चर्चा वहाँ चली,
गान्धी ने कहा दे दो अभी देर ना भली.
वरना ये कराँची में उठायेंगे फीर सवाल.
साबरमती के सन्त तूने कर दीया कमाल.
जब हरीपुरा चुनाव में गान्धी को मीली मात,
दोबारा से त्रीपुरी में हुई फीर ये करामात,
इस पर सवाल कार्यसमीती में ये उठाया,
गान्धी ने कहा फीर से इसे कीसने जीताया?
या तो इसे नीकालो या फीर दो मुझे नीकाल.
साबरमती के सन्त तूने कर दीया कमाल.
इस पर सुभाष कांग्रेस से नीकल गये,
जीन्दा मशाल बन के अपने आप जल गये,
बदकीस्मती से जंग में जापान गया हार,
मारे गये सुभाष ये करवा के दुष्प्रचार,
नेहरू के लीये कर दीया अम्नो-अमन बहाल.
साबरमती के सन्त तूने कर दीया कमाल.
आखीर में जब अंग्रेज गये घर से नीकाले,
था ये सवाल कौन सीयासत को सम्हाले,
जीन्ना की जीद थी मुल्क करो उनके हवाले,
उस ओर जवाहर के थे अन्दाज नीराले.
बँटवारा करके मुल्क में नफरत का बुना जाल.
साबरमती के सन्त तूने कर दीया कमाल...!!
साबरमती के सन्त तूने कर दीया कमाल.
उन्नीस सौ इक्कीस में असहयोग का फरमान,
गान्धी ने कीया जारी तो िहन्दू औ मुसलमान.
घर से नीकल पड़े थे हथेली पे लीये जान,
बाइस में चौरीचौरा में भड़के कई कीसान.
थाने को दीया फूँक तो गान्धी हुए बेहाल,
साबरमती के सन्त तूने कर दीया कमाल.
गान्धी ने कीया रद्द असहयोग का ऐलान,
यह देख भड़क उट्ठे कई लाख नौजवान,
बीस्मील ने लीखा इसपे-ये कैसा है महात्मा!
अंग्रेजों से डरती है सदा जीसकी आत्मा.
नीकला जो इश्तहार वो सचमुच था बेमीसाल,
साबरमती के सन्त तूने कर दीया कमाल.
पैसे की जरूरत थी बड़े काम के लीये,
लोगों की जरूरत थी इन्तजाम के लीये,
बीस्मील ने नौजवान इकट्ठे कई कीये,
छप्पन जीलों में संगठक तैनात कर दीये.
फीर लूट लीया एक दीन सरकार का ही माल,
साबरमती के सन्त तूने कर दीया कमाल.
चालीस गीरफ्तार हुए जेल में गये,
कुछ भेदीये भी बन के इसी खेल में गये,
पेशी हुई तो जज से कहा मेल में गये,
हम भी हुजूर चढ़ के उसी रेल में गये.
उनमें बनारसी भी था गान्धी का यक दलाल,
साबरमती के सन्त तूने कर दीया कमाल.
उसने कीया अप्रूव ये सरकारी खजाना,
बीस्मील ने ही लूटा है वो डाकू है पुराना,
गर छोड़ दीया उसको तो रोयेगा ज़माना,
फाँसी लगा के ख़त्म करो उसका फ़साना.
वरना वो मचायेगा दुबारा वही बबाल.
साबरमती के सन्त तूने कर दीया कमाल.
बीस्मील के साथ तीन और दार पर चढ़े,
जज्वा ये उनका देख नौजवान सब बढे,
सांडर्सका वध करके भगत सींह नीकल पड़े,
बम फोड़ने असेम्बली की ओर चल पड़े.
बम फोड़ के पर्चों को हवा में दीया उछाल.
साबरमती के सन्त तूने कर दीया कमाल.
इस सबकी सजा मौत भगत सींह को मीली,
जनता ने बहुत चाहा पे फाँसी नहीं टली,
इरवीन से हुआ पैक्ट तो चर्चा वहाँ चली,
गान्धी ने कहा दे दो अभी देर ना भली.
वरना ये कराँची में उठायेंगे फीर सवाल.
साबरमती के सन्त तूने कर दीया कमाल.
जब हरीपुरा चुनाव में गान्धी को मीली मात,
दोबारा से त्रीपुरी में हुई फीर ये करामात,
इस पर सवाल कार्यसमीती में ये उठाया,
गान्धी ने कहा फीर से इसे कीसने जीताया?
या तो इसे नीकालो या फीर दो मुझे नीकाल.
साबरमती के सन्त तूने कर दीया कमाल.
इस पर सुभाष कांग्रेस से नीकल गये,
जीन्दा मशाल बन के अपने आप जल गये,
बदकीस्मती से जंग में जापान गया हार,
मारे गये सुभाष ये करवा के दुष्प्रचार,
नेहरू के लीये कर दीया अम्नो-अमन बहाल.
साबरमती के सन्त तूने कर दीया कमाल.
आखीर में जब अंग्रेज गये घर से नीकाले,
था ये सवाल कौन सीयासत को सम्हाले,
जीन्ना की जीद थी मुल्क करो उनके हवाले,
उस ओर जवाहर के थे अन्दाज नीराले.
बँटवारा करके मुल्क में नफरत का बुना जाल.
साबरमती के सन्त तूने कर दीया कमाल...!!
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