अब समय ही कहाँ है के कविता लिखी जाये
अब जो बात है वो बस सीधी बताई जाये
अब तो जी वार्ता होती है कार्यालयीन
जलेबी जैसी कैसे अब बात घुमाई जाये
अब घूम भी जाये जो बात एक बार फिरसे
सन्दर्भ सहित व्याख्या भी तब बनायी जाए
व्याख्यान भी तो अब सीधे और क्रमिक होते हैं
नव ताल से कैसे काव्यिक धारा बहाई जाए
जलधारा सा तरंगित था जो जीवन
इस धारावाहिक से कैसे बाहर निकाली जाये
अब समय ही कहाँ है के कविता लिखी जाये
अब जो बात है वो बस यहीं ख़तम की जाये
----- आँखि
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