Thursday, 5 January 2017

मैं बेचारा


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परछाइयों का मज़मा था, गुलज़ार नहीं हुआ,
मैं बदबख़्त नाशाद था, आबाद नहीं हुआ.
बेशर्मों ने नंगे हो कर बेचा ख़ुदको, चौक पे,
मेरा ख़रीदार नहीं मिला, मैं शर्मसार ही हुआ.
शाम ढले गुलज़ार हुए कोठे तो हुईं हैरानी,
मेरा तो इक घर था, वो क्यों वीरान ही हुआ.
मैंने कौन सी ऐसी बेज़ा इनायत की मांग की,
क्यों मेरी नहीं सुनी, क्यों मेरा काम नहीं हुआ.
चोट गहरी देस बेगाना, बताते भी तो किस को,
अपने ही कंधे पर रोना, कभी आसान नहीं हुआ .
हाक़िम ने मेरे हिस्से का सूरज भी पी लिया,
आबाद होने आया था मैं, बर्बाद ही हुआ .
-अमर
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