Wednesday, 12 December 2012

 क्या होगा भईया मेरे देश का हाल !!

राजनीति हो गई वेश्या नेता बने दलाल,
ऐसे में क्या होगा भईया मेरे देश का हाल !

संसद को एक पलंग समझकर उस पर शयन किया
संविधान को मान के चादर खिंचा ओढ़ लिया
आज तिरंगे को लोगों ने बना लिया रुमाल
ऐसे में क्या होगा भईया मेरे देश का हाल !

बलात्कार जो आज हो रहा लोकतंत्र के साथ
सत्ता में हो या विपक्ष में सबका इसमें हाथ
किसी को भारत-माता की इज्ज़त का नहीं ख्याल
ऐसे में क्या होगा भईया मेरे देश का हाल !

अभी इधर कश्मीर सुलगता और उधर आसाम
प्रशासन के घोड़े की है टूटी हुई लगाम
कहीं पे सरपट भाग रहा है कहीं पे धीमी चाल
ऐसे में क्या होगा भईया मेरे देश का हाल !

जय जवान और जय किसान के नारे रोज़ लगे
लेकिन हर मजदूर किसान ही जाते रोज़ ठगे
अन्नदाता कहते हैं जिसको आज वही कंगाल
ऐसे में क्या होगा भईया मेरे देश का हाल !

डिप्लोमा की नहीं जरुरत डिग्री का क्या काम
की जाती है अब सिक्कों में नौकरियां नीलाम
फैला रखा है लोक सेवा आयोग ने अपना जाल
ऐसे में क्या होगा भईया मेरे देश का हाल !

कसाई जैसे दिखते हैं कुछ बड़े-बड़े अफसर
बूचड़खाने बने हुए हैं सरकारी दफ्तर
तेज़ छूरी से जहाँ हो रही जनता रोज़ हलाल
ऐसे में क्या होगा भईया मेरे देश का हाल !

अर्थव्यवस्था को क्यूँ आती नहीं जरा भी लाज
महंगाई क्यूँ नंगी होकर नाच रही आज
स्वदेशी तबले पे विदेशी पूंजी देती ताल
ऐसे में क्या होगा भईया मेरे देश का हाल !

(मुकीम भारती)

Monday, 26 November 2012



एक दिये की चुनौती 

ऐ रात, ऐ काली अंधियारी रात,
चाहे जितने तू फैला ले अपना तिमिर
फैला ले और अपने स्याह पंख 
चाहे साया भी मिट जाए इस त्रिभुवन का 
मेरी हस्ती ही चुनौती तुझ को 
मेरी लौ ही सबूत है इस बात का 
कि तू शाश्वत नहीं है,
कि अभी तक कोई है 
जिस ने तुझ से हार नहीं मानी है।
तू लाख जाबर सही, 
चाहे ठहर जाये नगरी सारी,
पस्त हो जाये कायनात सारी।  
चाहे सूरज बुझा दिया तूने
चाहे तारे धुँधला  दिए तूने
फिर भी देख मैं अडिग खड़ा हूँ । 
चाहे लौ थरथरा रही है मेरी 
फिर भी जल रही है
थोड़ी सी ही सही 
जगह रौशन तो कर रही है,
और दुनिया को पैगाम दे रही है 
कि जालिम मिट भी सकता है 
दर्द थोड़े समय के लिए ही सही,  
कम हो भी सकता है !
रात अपने भीषणतम रूप में 
अमावस के स्वरूप में,
भी मुझे मिटा नहीं पाएगी ।
अपितु अमावस ही खुद मुझे 
मेरे होने का मुझे अंतिम मकसद दे जायेगी !
                                             -- अमर
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Monday, 19 November 2012


ऐ बनारस बिन तेरे यह ज़िन्दगी वीरान है
इस महानगरी का हर बाज़ार ज्यों शम्शान है
चौक लहुराबीर अस्सी और लंका की अदाएं
कौन जाने ज़िन्दगी में फिर कभी आएं न आएं
क्या करेंगे यन्त्र बनकर सोच मन हैरान है
ऐ बनारस बिन तेरे...

उन मनोरम गालियों कि तिक्त मधु बौछार छूटी
घाट पर जो रोज घटती अल्ह्डी गुंजार छूटी
जो न तुझको जान पाया वो बड़ा अनजान है
ऐ बनारस बिन तेरे...

ज़िन्दगी क्या मौत में भी मस्तियाँ जो खोज लेता
राव हो या रंक शिव का नाम वो हर रोज लेता
शूल पर ठहरा शहर तिहुँलोक से भी महान है
ऐ बनारस बिन तेरे...

कुछ पता न तत्व क्या तुझमें जो मुझको खींचता है
कौन सा सोता जो इस संतप्त दिल को सींचता है
दम तेरे दामन में निकले बस यही अरमान है
ऐ बनारस बिन तेरे...

Tuesday, 6 November 2012


एक सलाह 


धोखा खाना है आदम की फ़ितरत मे शुमार,
ऐ दोस्त ! आज तू भी धोखा खा गया.
मामूली सा कांच भी नही हू मैं ,
तू समझा कि तू हीरा पा गया.
सच की दीवार पर झूठ का पर्दा डाला मैने,
तू समझा कि इन्द्र्धनुश छा गया.
मेरा कारोबार है, लफ़्ज़ो की तिज़ारत करना,
आज तू भी मेरे झान्से मे आ गया.


कभी मै भी हुआ करता था तुझ सा सादा,
फ़िर कोई मुझे सबक जिन्दगी का पढ़ा गया.
किसी लायक नही समझा अहल-ए-वफ़ा मुझ को,
दो बोल प्यार के पाने को मै थ्रर्रा गया.
फ़िर यूं किया मैने के किया बन्द दरवाज़ा-ए-दिल
ले कर जुबान पर सिर्फ़ लफ़्ज़ आ गया.
जब से सीखा है फ़न ये उस सौदागर से,
भरे बाज़ार जज़बात के मै पा गया.


बहुत तस्कीन है कि नही कोई रकीब मेरा,
कोई दोस्त भी नही, इक यही गच्चा खा गया.
अब आया है तू दोस्ती की खवाहिश ले कर,
जल जायेगा मुझ से, सच तुम्हे बता दिया.
अब भी वक्त है लौटा ले अपना उठता कदम,
तू मान-ना मान, मैने फ़र्ज़ अपना निभा दिया.

                                            --अमर

Monday, 5 November 2012

कोई तुम से पूछे गर, कौन हूँ मैं

कोई तुम से पूछे गर, कौन हूँ मैं,
तो कह देना कोई ख़ास नहीं, 
एक दोस्त है कच्चा-पक्का सा,
जज़्बात को ढांपे इक पर्दा सा, 
बस ! इक बहाना...अच्छा सा !


जो रूह के साथ अहसास भी है, 
वो दूर भी है और पास भी है, 
और पास रह कर भी पास नहीं. 
कोई तुम से पूछे गर, कौन हूँ मैं.
तो कह देना कोई ख़ास नहीं ! 


सच क्या है, दिलों को पता है,
तुझे पता है, मुझे पता है, 
दुनिया को अहसास नहीं.
कोई तुम से पूछे गर, कौन हूँ मैं
तो कह देना कोई ख़ास नहीं ! 


इक नाज़ुक से रिश्ते का नाता,
फूल-पांखुरी, ओस का नाता,
खुद-गरजी की आस नहीं. 
कोई तुम से पूछे गर, कौन हूँ मैं
तो कह देना कोई ख़ास नहीं ! 


बिजली बसी रूह बादल के,
वैसे तुम मेरे मन-आन्गन मे,
जिस्मो की दरकार नहीं.
कोई तुम से पूछे गर, कौन हूँ मैं
तो कह देना कोई ख़ास नहीं !


दर्द तेरे मै सारे पी कर,
गाऊ गीत नया जब प्रियतम,
फ़न रहू मै, फ़नकार तू ही, 
कोई तुम से पूछे गर, कौन हूँ मैं
तो कह देना कोई ख़ास नहीं !


मिलना- बिछुड़ना रीत पुरानी, 
वक़्त दोहराए शायद यही कहानी,
पर संग छूटेगा, साथ नहीं. 
कोई तुम से पूछे गर, कौन हूँ मैं
तो कह देना कोई ख़ास नहीं !


मेरे नक्श पे तेरा साया
मन्ज़िल मेरी, सफ़र पराया
कोई काफ़िला साथ नहीं 
कोई तुम से पूछे गर, कौन हूँ मैं
तो कह देना कोई ख़ास नहीं !


मन मे ख्वाब सजाये रखना,
साथ के दीप जलाये रखना,
फ़िर चाहे हाथ मे हाथ नही.
कोई तुम से पूछे गर, कौन हूँ मैं
तो कह देना कोई ख़ास नहीं !


तुम मेरे सपनो मे आना, 
मुझ को तुम ख्वाबो मे पाना,
विरह सी कोई बात नही.
कोई तुम से पूछे गर, कौन हूँ मैं
तो कह देना कोई ख़ास नहीं !


इस जन्म तो यही कहानी, 
हो इक अगले जन्म, राजा-रानी,
प्यार रहे फ़िर प्यास नही.
कोई तुम से पूछे गर, कौन हूँ मैं
तो कह देना कोई ख़ास नहीं !


एक दोस्त है कच्चा-पक्का सा,
जज़्बात को ढांपे इक पर्दा सा, 
बस ! इक बहाना...अच्छा सा !

                           - अमर

Sunday, 4 November 2012


तब मैने तुझ को याद किया !

स्याह अन्धियारी रातों में,  
हसीं-खुशी की बातो में,
अध-जगी, उनींदी पलकों ने
जब जब तेरा नाम लिया
तब मैने तुझ को याद किया !

उजले दिन के आँगन मे,
घनघोर बरसते सावन मे,
ठन्डी कज़रारी रातों मे,
जब रूह को देह से आज़ाद किया
तब मैने तुझ को याद किया !

दुख की अन्धी गलियों में,
अध-खिली गुलाब की कलियों मे,
सुहाने आस के मौसम में,
जब चार-सू तेरा अक्स पिया
तब मैने तुझ को याद किया !

सावन मे चली पुरवाई में,
सर-ए-बज़्म हुई तनहाई में,
सन्नाटे की शहनाई में ,
तेरा साया हर पल साथ जिया
तब मैने तुझ को याद किया !

भरे दरबार हुई रुसवाई में,
नम आँख, नज़र धुंधलाई में,
अपने प्यार को दी विदाई में,
सिले होंठों से जब तेरा नाम लिया 
तब मैने तुझ को याद किया !

तब मैने तुझ को याद किया !

                            - अमर 

Friday, 2 November 2012

आईने बेचता हूँ


तेरे आज के अम्ल में, मैं तेरा कल देखता हूँ,
अंधों के नगर में मैं पागल, आईने बेचता हूँ !

अस्मत की कीमत पैसा, यारों का यार पैसा, 
मैं ऐसी ही सोच पर तो, सर अपना फोड़ता हूँ !  

तू खेल खेले मुझ से, है इस की खबर मुझ को,
तेरा खिलौना बन कर, मैं रोज़ टूटता हूँ !

तू ला-इल्म है कल से, अंजाम से नावाकिफ, 
मैं दर पे तेरे क्यों कर, कुत्ते सा भौंकता हूँ  !

क्या मुझ को है हासिल, क्यों कल की फ़िक्र तेरे,
बेकार की मश्क क्यों,  अक्सर मैं सोचता हूँ  !

तेरे रास्ते का मैं पत्थर, तेरी राह से हटूंगा,
तन्हाई  के फलक पे , मैं खुद को तोलता हूँ  !

है इश्क की रिवायत, खुद ख़ाक में मिल जाना,
अंजाम जो हो सर-माथे, अब क्यों मैं सोचता हूँ !

है इश्क मुझे को तुझ से, तुझ से गिला ना कोई,
तेरे कल की फ़िक्र मुझ को, बस इतना सोचता हूँ  !

तेरे आज के अम्ल में, मैं तेरा कल देखता हूँ,
अंधों के नगर में मैं पागल, आईने बेचता हूँ  !
                                     ---अमर 

Wednesday, 24 October 2012


ज़िन्दगी सोचो तो मौत की मेहेरबानी है
वो ऐसे के ये तो आनी जानी है

दिल की धड़कने तो कभी कभी सुनते हैं
सांस रुक जाना तो रोज़ की कहानी है 

उजाला तभी होता है जब कोई दे 
अँधेरा तो सब जगह पैमानी है

ज़िन्दगी के पीछे भागनेवालों सोचो
मौत तो फिर भी आनी है

आंखी
दिल पे जख्मों के निशाँ क्या गिनें ...... 
गिनते हूए सुबह से लो शाम आ गयी .... 

आंखी

क्या नहीं है
इन घुच्ची आँखों में
इन शातिर निगाहों में
मुझे तो बहुत कुछ
प्रतिफलित लग रहा है!
नफरत की धधकती भट्टियाँ...
प्यार का अनूठा रसायन...
अपूर्व विक्षोभ...
जिज्ञासा की बाल-सुलभ ताजगी...
ठगे जाने की प्रायोगिक सिधाई...
प्रवंचितों के प्रति अथाह ममता...
क्या नहीं झलक रही
इन घुच्ची आँखों से?
हाय, हमें कोई बतलाए तो!
क्या नहीं है
इन घुच्ची आँखों में!
--
नागार्जुन

Wednesday, 10 October 2012

भाई भोजपुरिया




भाई भोजपुरिया हो भाई भोजपुरिया ,


कर ना तुही कुछ जोगार ना त देसवा बिरान हो जाई ,

अठारह स संतावन या उनीस स बेआलिस हो ,

पड़ल बा तहरे दरकार ना त देसवा बेजार हो जाई ,

तोहरे में मंगल पांडे अलख जगावे ले ,

तोहरे में बाबु कुंवर दमवा दिखावे ले ,

अस्सी में आवे ला बाहार जब देसवा से प्यार हो जाई

भाई भोजपुरिया हो भाई भोजपुरिया 
,
कर ना तुही कुछ जोगार ना त देसवा बिरान हो जाई ,

गाँधी जी में ताकत तोहरे से आइल हो ,

गोरान अंग्रेजन के मन घबराइल हो ,

बड़ी जोड़ से बही जब बेयार की दुश्मन के नाश हो जाई ,

जय प्रकाश नारायण के के नइखे जानत हो ,

अइसन बहवाले उ सामाजिक बेयार इमरजेंसी तबाह हो जाई..



Ravi Kumar Giri

Sunday, 7 October 2012


सारे जहां से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा,
हम बुलबुलें हैं इसकी ये गुलगुला हमारा।

बुड्ढे कुंवारियों से नैना लड़ा रहे हैं,
मकबूल माधुरी की पेंटिंग बना रहे हैं,
ऊपर उगी सफेदी भीतर दबा अंगारा,
सारे जहां से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा।

सत्ता के सिंह बकरी की घास खा रहे हैं,
गांधी की लंगोटी का बैनर बना रहे हैं,
चर-चर के खा रहे हैं चरखे का हर किनारा,
सारे जहां से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा।

नारी निकेतन उसके ही बल पे चल रहे हैं,
हर इक गली में छै छै बच्चे उछल रहे हैं,
जिसको समझ रहा है सारा शहर कुंवारा,
सारे जहां से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा।

दंगा कराने वाले गंगा नहा रहे हैं,
चप्पल चुराने वाले मंदिर में जा रहे हैं,
थाने में बंट रहा है चोरी का माल सारा,
सारे जहां से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा।

साहब के संग सेक्रेटरी पिकनिक मना रही हैं,
बीवी जी ड्राइवर संग डिस्को में जा रही हैं,
हसबैण्ड से भी ज्यादा मैडम को टॉमी प्यारा,
सारे जहां से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा।

जो मर्द हैं वो घर में करते हैं मौज देखो,
लालू के घर लगी है बच्चों की फौज देखो,
परिवार नियोजन का किन्नर लगाएं नारा,
सारे जहां से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा।

है छूट लूटने की ए देश लूट खाओ,
लेने में पकड़ जाओ तो देकर के छूट जाओ,
चाहे जहाँ पे थूको, खुलकर बहाओ धारा,
सारे जहां से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा।

कोठे में जो पड़े थे, कोठी में रह रहे हैं,
खुद को शिखंडी सिंह की औलाद कह रहे हैं,
जनता के वास्ते तो मुश्किल है ईंट गारा,
सारे जहां से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा।

........................
डा. सुनील जोगी

गुर गोबिन्द सिंह जी को उनके निर्वाण दिवस पर श्रद्धांजली

                         http://ankhikavitasangrah.blogspot.in/
"अंगार दहकते पथ पर भी हम कभी मौत से डरे नही
सो-सौ घाव सहे सीने पर मर कर भी हम मरे नही ।
बारूदी चिंगारी तो क्या दावानल से जले नही
दिवारो मे चुने गये पर धर्म युद्ध से टले नही ।
होड मचेगी फिर भारत के बेटो के बलिदान की
फिर शोणित से लिखनी होगी गाथा हिन्दुस्तान की ।
उठो हिन्द के वीर वतन की किलकारी मे जोश भरो
धरती अम्बर गूंज उठे वो भीषणतम जय घोष करो ॥

जय हिन्द

via Banaras Ki Galiyan