तेरे आज के अम्ल में, मैं तेरा कल देखता हूँ,
अंधों के नगर में मैं पागल, आईने बेचता हूँ !
अस्मत की कीमत पैसा, यारों का यार पैसा,
मैं ऐसी ही सोच पर तो, सर अपना फोड़ता हूँ !
तू खेल खेले मुझ से, है इस की खबर मुझ को,
तेरा खिलौना बन कर, मैं रोज़ टूटता हूँ !
तू ला-इल्म है कल से, अंजाम से नावाकिफ,
मैं दर पे तेरे क्यों कर, कुत्ते सा भौंकता हूँ !
क्या मुझ को है हासिल, क्यों कल की फ़िक्र तेरे,
बेकार की मश्क क्यों, अक्सर मैं सोचता हूँ !
तेरे रास्ते का मैं पत्थर, तेरी राह से हटूंगा,
तन्हाई के फलक पे , मैं खुद को तोलता हूँ !
है इश्क की रिवायत, खुद ख़ाक में मिल जाना,
अंजाम जो हो सर-माथे, अब क्यों मैं सोचता हूँ !
है इश्क मुझे को तुझ से, तुझ से गिला ना कोई,
तेरे कल की फ़िक्र मुझ को, बस इतना सोचता हूँ !
तेरे आज के अम्ल में, मैं तेरा कल देखता हूँ,
अंधों के नगर में मैं पागल, आईने बेचता हूँ !
---अमर
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