Friday, 2 November 2012

आईने बेचता हूँ


तेरे आज के अम्ल में, मैं तेरा कल देखता हूँ,
अंधों के नगर में मैं पागल, आईने बेचता हूँ !

अस्मत की कीमत पैसा, यारों का यार पैसा, 
मैं ऐसी ही सोच पर तो, सर अपना फोड़ता हूँ !  

तू खेल खेले मुझ से, है इस की खबर मुझ को,
तेरा खिलौना बन कर, मैं रोज़ टूटता हूँ !

तू ला-इल्म है कल से, अंजाम से नावाकिफ, 
मैं दर पे तेरे क्यों कर, कुत्ते सा भौंकता हूँ  !

क्या मुझ को है हासिल, क्यों कल की फ़िक्र तेरे,
बेकार की मश्क क्यों,  अक्सर मैं सोचता हूँ  !

तेरे रास्ते का मैं पत्थर, तेरी राह से हटूंगा,
तन्हाई  के फलक पे , मैं खुद को तोलता हूँ  !

है इश्क की रिवायत, खुद ख़ाक में मिल जाना,
अंजाम जो हो सर-माथे, अब क्यों मैं सोचता हूँ !

है इश्क मुझे को तुझ से, तुझ से गिला ना कोई,
तेरे कल की फ़िक्र मुझ को, बस इतना सोचता हूँ  !

तेरे आज के अम्ल में, मैं तेरा कल देखता हूँ,
अंधों के नगर में मैं पागल, आईने बेचता हूँ  !
                                     ---अमर 

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