Monday, 19 November 2012


ऐ बनारस बिन तेरे यह ज़िन्दगी वीरान है
इस महानगरी का हर बाज़ार ज्यों शम्शान है
चौक लहुराबीर अस्सी और लंका की अदाएं
कौन जाने ज़िन्दगी में फिर कभी आएं न आएं
क्या करेंगे यन्त्र बनकर सोच मन हैरान है
ऐ बनारस बिन तेरे...

उन मनोरम गालियों कि तिक्त मधु बौछार छूटी
घाट पर जो रोज घटती अल्ह्डी गुंजार छूटी
जो न तुझको जान पाया वो बड़ा अनजान है
ऐ बनारस बिन तेरे...

ज़िन्दगी क्या मौत में भी मस्तियाँ जो खोज लेता
राव हो या रंक शिव का नाम वो हर रोज लेता
शूल पर ठहरा शहर तिहुँलोक से भी महान है
ऐ बनारस बिन तेरे...

कुछ पता न तत्व क्या तुझमें जो मुझको खींचता है
कौन सा सोता जो इस संतप्त दिल को सींचता है
दम तेरे दामन में निकले बस यही अरमान है
ऐ बनारस बिन तेरे...

No comments:

Post a Comment