एक सलाह
ऐ दोस्त ! आज तू भी धोखा खा गया.
मामूली सा कांच भी नही हू मैं ,
तू समझा कि तू हीरा पा गया.
सच की दीवार पर झूठ का पर्दा डाला मैने,
तू समझा कि इन्द्र्धनुश छा गया.
मेरा कारोबार है, लफ़्ज़ो की तिज़ारत करना,
आज तू भी मेरे झान्से मे आ गया.
कभी मै भी हुआ करता था तुझ सा सादा,
फ़िर कोई मुझे सबक जिन्दगी का पढ़ा गया.
किसी लायक नही समझा अहल-ए-वफ़ा मुझ को,
दो बोल प्यार के पाने को मै थ्रर्रा गया.
फ़िर यूं किया मैने के किया बन्द दरवाज़ा-ए-दिल
ले कर जुबान पर सिर्फ़ लफ़्ज़ आ गया.
जब से सीखा है फ़न ये उस सौदागर से,
भरे बाज़ार जज़बात के मै पा गया.
बहुत तस्कीन है कि नही कोई रकीब मेरा,
कोई दोस्त भी नही, इक यही गच्चा खा गया.
अब आया है तू दोस्ती की खवाहिश ले कर,
जल जायेगा मुझ से, सच तुम्हे बता दिया.
अब भी वक्त है लौटा ले अपना उठता कदम,
तू मान-ना मान, मैने फ़र्ज़ अपना निभा दिया.
--अमर
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