अब की बार तो हुस्न-ऐ-यार ने कमाल कर दिया,
ऐसा दिया ज़वाब के ला-ज़वाब कर दिया।
ख़ुद तो शाइस्ता है चौहदवीं के चाँद के मानिंद,
ऐसी लगाई आग के मुझे सूरज-मिसाल कर दिया।
इक वक्त था के खुश करता था मुस्कुरा के देख कर,
कर कर के नज़रअंदाज़ इस बार तो निहाल कर दिया।
क्या सलीके से डसा इस बार तो मेरे यार ने मुझे,
हक़ीक़त को मेरी पल में ख़्वार-ओ-ख़्वार कर दिया।
दीवाने से दीवाने के जीने की वजह ही छीन ली,
मरना तो मुश्किल था ही, जीना भी बवाल कर दिया।
-अमर
बहोत खूब जनाब
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