Wednesday, 11 January 2017

आवाजों की #जुगलबंदी

आवाजों में भी एक सफर है..
आवाजों में भी एक कहानी है..
आवाजों का भी किरदार है..
गाँव में कहीं दूर से आती हुई इंजन की आवाज
रात में आती झींगुरों की आवाज,
तेज हवा के चलने का रुआब
पत्थर के पानी में गिरने पर आती एक गहरी चीख
कुँए में अपना खुद का नाम चीख के वापस आती आवाज
पुल से रेल निकलते वक़्त बदल जाने वाली आवाज
यामाहा RX 100 के दुसरे गियर वाली आवाज
मम्मी,दादी की अलग से पहचान में आ जाने वाली पायल की आवाज
पिताजी के अखबार को झिड़क के खोलने पर आने वाली कड़क कागज़ी आवाज
स्टील के ग्लासों को कान पे लगाने पर आने वाली सांय सांय,
बहते पानी का कोलाहल,
सुबह होते ही चिड़ियों के गाने की आवाज
इंटरवल ख़त्म हो जाने पर बजने वाली घंटी की आवाज..
बड़े दिनोँ से बन्द किसी दरवाजे को खोलने पर आने वाली आवाज..
बोतल से गिलास मेँ दारू डालते वक्त आने वाली आवाज..
गली के नुक्कड़ से ही पिताजी के स्कूटर के होर्न की पहचान मेँ आ जाने वाली आवाज.
जेब मे खनखते सिक्कोँ की आवाज
कभी-कभी गीली हवाई-चप्पलोँ को पहनकर चलने पर आने वाली आवाज
स्टोर-रूम मेँ लड़ते चूहोँ की आवाज
गली के फेरी वालोँ की आवाज
खरंजोँ-गड्रडोँ पर साईकिल की घण्टी की खुद ही बजने वाली आवाज
गाय-भैँस के गले मेँ लटके घण्टी की आवाज
बरसीम काटते वक्त आने वाली आवाज
पानी आने से पहले हैण्डपम्प मेँ आने वाली एयर की आवाज
वाकई..आवाजोँ मेँ एक सफर होता है
एक कहानी होती है..
और उनके भी किरदार होते हैँ..

अनजान

Thursday, 5 January 2017

जाने कौन जन्म का नाता

तुझ से जाने कौन जन्म का नाता,
बहुत सोचा मैं पर समझ न पाता।
कभी माँ बन मेरे सपनों में आवें,
और कभी बेटी बन हुक्म चलावें !
कभी बड़ी बहन बन मेरे आंसूं पोंछें,
कभी छोटी बहना की जिद के झोंके !
और कभी मेरा मकान तू घर बनावें
सांसें मेरी सब सन्दल सी महकाएं !
पर ये तो सब हैं सपनों की बातें
गुपचुप राज़ भरी अपनों की बातें !
राज़ मेरे सब तुझ पर ज़ाहिर,
मुश्किल रु-ब-रु, फिर भी हाज़िर !
सच चाहे मैं हरगिज़ न मानूं,
पर तू जाने है , यह मैं जानूँ !
आस ना कोई, फिर भी ख़ास
नेह की बारिश, नेह की प्यास !
और सच में तू जैसी है, वैसी ही रहना
फिर चाहे मत मुझे अपना कहना !
बस कभी कभी मेरे सपनों में आना
आ कर मुझे तुम अपना बताना !
-- अमर
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विपरीत मायने


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पुण्य-पाप
दिन-रात,
धूप-छांव,
सांझ-सबेरा,
काया-छाया,
आकाश-पताल,
सुख-दुःख,
मिलना-बिछड़ना,
उल्फत-नफरत,
सफ़ेद-स्याह,
सच-झूठ,
ख़ुशी-ग़म,
हँसना-रोना,
सही-ग़लत,
आबाद-बरबाद,
क़ातिल-मक़तूल,
ये सब.....ऐसे जैसे
तू और मैं !
-- अमर
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ये और वो


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ये सिसकियाँ,वो ठुकराना।  
ये हिचकियाँ,वो चले जाना।
ये आदतें, वो आहटें।
ये सदायेँ, वो अदायें।
ये वफ़ायें, वो जफ़ायें।
ये मिन्नतें, वो लानतें।
ये लुट जाना,वो लूट जाना।
ये करम , वो सितम ।
ये प्यार,वो व्यौपार।
ये मैं और वो तू  !
-अमर
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क्या कहूँ

क्या कहूँ आप से, लफ्ज़ कम पड़ जातें हैं,
बयां करे ज़ज़्बात तो नयन नम पड़ जातें हैं.
कुछ ऐसी ही किस्मत लिखा के लाया है बंदा, ऐ दोस्त
लिखें "ख़ुशी" जो तो फ़रिश्ते उसे "ग़म" पढ़ जाते हैं।
-अमर
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मैं बेचारा


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परछाइयों का मज़मा था, गुलज़ार नहीं हुआ,
मैं बदबख़्त नाशाद था, आबाद नहीं हुआ.
बेशर्मों ने नंगे हो कर बेचा ख़ुदको, चौक पे,
मेरा ख़रीदार नहीं मिला, मैं शर्मसार ही हुआ.
शाम ढले गुलज़ार हुए कोठे तो हुईं हैरानी,
मेरा तो इक घर था, वो क्यों वीरान ही हुआ.
मैंने कौन सी ऐसी बेज़ा इनायत की मांग की,
क्यों मेरी नहीं सुनी, क्यों मेरा काम नहीं हुआ.
चोट गहरी देस बेगाना, बताते भी तो किस को,
अपने ही कंधे पर रोना, कभी आसान नहीं हुआ .
हाक़िम ने मेरे हिस्से का सूरज भी पी लिया,
आबाद होने आया था मैं, बर्बाद ही हुआ .
-अमर
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यादें

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यक-ब-यक चलते चलते,
देखा जो पीछे मुड़ के,
कुछ वफायें रो रहीं थी,
कुछ रिश्ते सिसक रहे थे.
कुछ यकीन थे कतरा-कतरा,
कुछ अक़ीदतें पुर्ज़ा-पुर्ज़ा,  
कुछ फूल जल रहे थे,
कुछ लम्हें सुलग रहे थे,
कुछ ख़्वाब बिख़र रहे थे,
कुछ वादे पलट रहे थे.
कुछ नामवर से चेहरे,
तेरे नाम में सिमट रहे थे,
कुछ पोशीदा से किस्से,
सड़क पे घिसट रहे थे.  
कुछ सितारे थे मध्यम-मध्यम,
कुछ चाँद धुंधले-धुंधले,
थी तिशनगी बे-लिहाज सी,
तेरी अंजुमन में मरते मरते  
लगी जो पैर पे ठोकर,
संभला मैं गिरते गिरते,
इक छन्न सी आवाज़ आयी,
कुछ तो जरूर फूटा,
दिल था या अना मेरी,
कुछ तो जरूर टूटा,
खोली जो गठरी ज़हन की ,
मन ही मन में डरते-डरते,  
कुछ पाक़ीज़ा सी यादों ने ज़बरदस्ती......
सीली आखों में बसेरा कर लिया।
-- अमर

यक-ब-यक      : अचानक
अक़ीदत          : श्रद्धा
पोशीदा           : गुप्त
तिशनगी          : प्यास
अंजुमन          : महफ़िल
अना              : अहम्
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मिलना

मिलना छोड़ दिया उन सब से, जो किसी मतलब से मिलते थे,
उन्हें हम आज भी मिलते हैं, जिन्हें बस ! मिलने से मतलब है.
-अमर
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अब की बार

अब की बार तो हुस्न-ऐ-यार ने कमाल कर दिया,
ऐसा दिया ज़वाब के ला-ज़वाब कर दिया।

ख़ुद तो शाइस्ता है चौहदवीं के चाँद के मानिंद,
ऐसी लगाई आग के मुझे सूरज-मिसाल कर दिया।
इक वक्त था के खुश करता था मुस्कुरा के देख कर,
कर कर के नज़रअंदाज़ इस बार तो निहाल कर दिया।
क्या सलीके से डसा इस बार तो मेरे यार ने मुझे,
हक़ीक़त को मेरी पल में ख़्वार-ओ-ख़्वार कर दिया।
दीवाने से दीवाने के जीने की वजह ही छीन ली,
मरना तो मुश्किल था ही, जीना भी बवाल कर दिया।
-अमर

वो दिलबर

वो दिलबर जो दिल में बसा है, यूं समझिये ! थोड़ा सा बदगुमां है,
पर उस के बिना गुज़र भी कहाँ, उस जैसा दूजा कोई और कहाँ है।
रूठना-मनाना, फिर रूठना-फिर मनाना, फिर से रूठ जाना,
ये मुहब्बत की अजब सी वहशत उस के और मेरे दरमियाँ है।
इक इबादत ख़त्म, एक अलामत शुरू, ये कतार लंबी लगती है,
महबूब जाने या ख़ुदा जाने, ये कहां से कहां तक का सिलसिला है।
साथ चल रहे हैं दोनों के लम्हा-दर-लम्हा बस उम्र कट रही सारी,
यूं तो वही है रस्ता, वही हवा, वही फ़िज़ा, सब वैसे ही ग़मज़दा है।
-अमर
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राम करे !

राम करे ! 
परवरदिगार तुझ पर सदा मेहरबान रहे,
राम करे ! 
सब रूहें तेरी सोहबत की कद्रदान रहें ।
राम करे ! 
आँख तेरी कभी ना बरसे, ना झुके ,
राम करे ! 
तेरी खुशियों का खज़ाना कभी न चुके।
राम करे ! 
तेरे लफ़्ज़ सदा अपना जादू जगाते रहें,
राम करे ! 
सुनने वालों को तिलिस्म दिखाते रहें।
राम करे ! 
तू सारी दुनिया में मक़बूल हो जाये,
राम करे ! 
मेरी ये दुआ क़ुबूल हो जाये।
-- अमर
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