एक दिये की चुनौती
ऐ रात, ऐ काली अंधियारी रात,
चाहे जितने तू फैला ले अपना तिमिर
फैला ले और अपने स्याह पंख
चाहे साया भी मिट जाए इस त्रिभुवन का
मेरी हस्ती ही चुनौती तुझ को
मेरी लौ ही सबूत है इस बात का
कि तू शाश्वत नहीं है,
कि अभी तक कोई है
जिस ने तुझ से हार नहीं मानी है।
तू लाख जाबर सही,
चाहे ठहर जाये नगरी सारी,
पस्त हो जाये कायनात सारी।
चाहे सूरज बुझा दिया तूने
चाहे तारे धुँधला दिए तूने
फिर भी देख मैं अडिग खड़ा हूँ ।
चाहे लौ थरथरा रही है मेरी
फिर भी जल रही है
थोड़ी सी ही सही
जगह रौशन तो कर रही है,
और दुनिया को पैगाम दे रही है
कि जालिम मिट भी सकता है
दर्द थोड़े समय के लिए ही सही,
कम हो भी सकता है !
रात अपने भीषणतम रूप में
अमावस के स्वरूप में,
भी मुझे मिटा नहीं पाएगी ।
अपितु अमावस ही खुद मुझे
मेरे होने का मुझे अंतिम मकसद दे जायेगी !
-- अमर
-- अमर
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