Monday, 26 November 2012



एक दिये की चुनौती 

ऐ रात, ऐ काली अंधियारी रात,
चाहे जितने तू फैला ले अपना तिमिर
फैला ले और अपने स्याह पंख 
चाहे साया भी मिट जाए इस त्रिभुवन का 
मेरी हस्ती ही चुनौती तुझ को 
मेरी लौ ही सबूत है इस बात का 
कि तू शाश्वत नहीं है,
कि अभी तक कोई है 
जिस ने तुझ से हार नहीं मानी है।
तू लाख जाबर सही, 
चाहे ठहर जाये नगरी सारी,
पस्त हो जाये कायनात सारी।  
चाहे सूरज बुझा दिया तूने
चाहे तारे धुँधला  दिए तूने
फिर भी देख मैं अडिग खड़ा हूँ । 
चाहे लौ थरथरा रही है मेरी 
फिर भी जल रही है
थोड़ी सी ही सही 
जगह रौशन तो कर रही है,
और दुनिया को पैगाम दे रही है 
कि जालिम मिट भी सकता है 
दर्द थोड़े समय के लिए ही सही,  
कम हो भी सकता है !
रात अपने भीषणतम रूप में 
अमावस के स्वरूप में,
भी मुझे मिटा नहीं पाएगी ।
अपितु अमावस ही खुद मुझे 
मेरे होने का मुझे अंतिम मकसद दे जायेगी !
                                             -- अमर
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Monday, 19 November 2012


ऐ बनारस बिन तेरे यह ज़िन्दगी वीरान है
इस महानगरी का हर बाज़ार ज्यों शम्शान है
चौक लहुराबीर अस्सी और लंका की अदाएं
कौन जाने ज़िन्दगी में फिर कभी आएं न आएं
क्या करेंगे यन्त्र बनकर सोच मन हैरान है
ऐ बनारस बिन तेरे...

उन मनोरम गालियों कि तिक्त मधु बौछार छूटी
घाट पर जो रोज घटती अल्ह्डी गुंजार छूटी
जो न तुझको जान पाया वो बड़ा अनजान है
ऐ बनारस बिन तेरे...

ज़िन्दगी क्या मौत में भी मस्तियाँ जो खोज लेता
राव हो या रंक शिव का नाम वो हर रोज लेता
शूल पर ठहरा शहर तिहुँलोक से भी महान है
ऐ बनारस बिन तेरे...

कुछ पता न तत्व क्या तुझमें जो मुझको खींचता है
कौन सा सोता जो इस संतप्त दिल को सींचता है
दम तेरे दामन में निकले बस यही अरमान है
ऐ बनारस बिन तेरे...

Tuesday, 6 November 2012


एक सलाह 


धोखा खाना है आदम की फ़ितरत मे शुमार,
ऐ दोस्त ! आज तू भी धोखा खा गया.
मामूली सा कांच भी नही हू मैं ,
तू समझा कि तू हीरा पा गया.
सच की दीवार पर झूठ का पर्दा डाला मैने,
तू समझा कि इन्द्र्धनुश छा गया.
मेरा कारोबार है, लफ़्ज़ो की तिज़ारत करना,
आज तू भी मेरे झान्से मे आ गया.


कभी मै भी हुआ करता था तुझ सा सादा,
फ़िर कोई मुझे सबक जिन्दगी का पढ़ा गया.
किसी लायक नही समझा अहल-ए-वफ़ा मुझ को,
दो बोल प्यार के पाने को मै थ्रर्रा गया.
फ़िर यूं किया मैने के किया बन्द दरवाज़ा-ए-दिल
ले कर जुबान पर सिर्फ़ लफ़्ज़ आ गया.
जब से सीखा है फ़न ये उस सौदागर से,
भरे बाज़ार जज़बात के मै पा गया.


बहुत तस्कीन है कि नही कोई रकीब मेरा,
कोई दोस्त भी नही, इक यही गच्चा खा गया.
अब आया है तू दोस्ती की खवाहिश ले कर,
जल जायेगा मुझ से, सच तुम्हे बता दिया.
अब भी वक्त है लौटा ले अपना उठता कदम,
तू मान-ना मान, मैने फ़र्ज़ अपना निभा दिया.

                                            --अमर

Monday, 5 November 2012

कोई तुम से पूछे गर, कौन हूँ मैं

कोई तुम से पूछे गर, कौन हूँ मैं,
तो कह देना कोई ख़ास नहीं, 
एक दोस्त है कच्चा-पक्का सा,
जज़्बात को ढांपे इक पर्दा सा, 
बस ! इक बहाना...अच्छा सा !


जो रूह के साथ अहसास भी है, 
वो दूर भी है और पास भी है, 
और पास रह कर भी पास नहीं. 
कोई तुम से पूछे गर, कौन हूँ मैं.
तो कह देना कोई ख़ास नहीं ! 


सच क्या है, दिलों को पता है,
तुझे पता है, मुझे पता है, 
दुनिया को अहसास नहीं.
कोई तुम से पूछे गर, कौन हूँ मैं
तो कह देना कोई ख़ास नहीं ! 


इक नाज़ुक से रिश्ते का नाता,
फूल-पांखुरी, ओस का नाता,
खुद-गरजी की आस नहीं. 
कोई तुम से पूछे गर, कौन हूँ मैं
तो कह देना कोई ख़ास नहीं ! 


बिजली बसी रूह बादल के,
वैसे तुम मेरे मन-आन्गन मे,
जिस्मो की दरकार नहीं.
कोई तुम से पूछे गर, कौन हूँ मैं
तो कह देना कोई ख़ास नहीं !


दर्द तेरे मै सारे पी कर,
गाऊ गीत नया जब प्रियतम,
फ़न रहू मै, फ़नकार तू ही, 
कोई तुम से पूछे गर, कौन हूँ मैं
तो कह देना कोई ख़ास नहीं !


मिलना- बिछुड़ना रीत पुरानी, 
वक़्त दोहराए शायद यही कहानी,
पर संग छूटेगा, साथ नहीं. 
कोई तुम से पूछे गर, कौन हूँ मैं
तो कह देना कोई ख़ास नहीं !


मेरे नक्श पे तेरा साया
मन्ज़िल मेरी, सफ़र पराया
कोई काफ़िला साथ नहीं 
कोई तुम से पूछे गर, कौन हूँ मैं
तो कह देना कोई ख़ास नहीं !


मन मे ख्वाब सजाये रखना,
साथ के दीप जलाये रखना,
फ़िर चाहे हाथ मे हाथ नही.
कोई तुम से पूछे गर, कौन हूँ मैं
तो कह देना कोई ख़ास नहीं !


तुम मेरे सपनो मे आना, 
मुझ को तुम ख्वाबो मे पाना,
विरह सी कोई बात नही.
कोई तुम से पूछे गर, कौन हूँ मैं
तो कह देना कोई ख़ास नहीं !


इस जन्म तो यही कहानी, 
हो इक अगले जन्म, राजा-रानी,
प्यार रहे फ़िर प्यास नही.
कोई तुम से पूछे गर, कौन हूँ मैं
तो कह देना कोई ख़ास नहीं !


एक दोस्त है कच्चा-पक्का सा,
जज़्बात को ढांपे इक पर्दा सा, 
बस ! इक बहाना...अच्छा सा !

                           - अमर

Sunday, 4 November 2012


तब मैने तुझ को याद किया !

स्याह अन्धियारी रातों में,  
हसीं-खुशी की बातो में,
अध-जगी, उनींदी पलकों ने
जब जब तेरा नाम लिया
तब मैने तुझ को याद किया !

उजले दिन के आँगन मे,
घनघोर बरसते सावन मे,
ठन्डी कज़रारी रातों मे,
जब रूह को देह से आज़ाद किया
तब मैने तुझ को याद किया !

दुख की अन्धी गलियों में,
अध-खिली गुलाब की कलियों मे,
सुहाने आस के मौसम में,
जब चार-सू तेरा अक्स पिया
तब मैने तुझ को याद किया !

सावन मे चली पुरवाई में,
सर-ए-बज़्म हुई तनहाई में,
सन्नाटे की शहनाई में ,
तेरा साया हर पल साथ जिया
तब मैने तुझ को याद किया !

भरे दरबार हुई रुसवाई में,
नम आँख, नज़र धुंधलाई में,
अपने प्यार को दी विदाई में,
सिले होंठों से जब तेरा नाम लिया 
तब मैने तुझ को याद किया !

तब मैने तुझ को याद किया !

                            - अमर 

Friday, 2 November 2012

आईने बेचता हूँ


तेरे आज के अम्ल में, मैं तेरा कल देखता हूँ,
अंधों के नगर में मैं पागल, आईने बेचता हूँ !

अस्मत की कीमत पैसा, यारों का यार पैसा, 
मैं ऐसी ही सोच पर तो, सर अपना फोड़ता हूँ !  

तू खेल खेले मुझ से, है इस की खबर मुझ को,
तेरा खिलौना बन कर, मैं रोज़ टूटता हूँ !

तू ला-इल्म है कल से, अंजाम से नावाकिफ, 
मैं दर पे तेरे क्यों कर, कुत्ते सा भौंकता हूँ  !

क्या मुझ को है हासिल, क्यों कल की फ़िक्र तेरे,
बेकार की मश्क क्यों,  अक्सर मैं सोचता हूँ  !

तेरे रास्ते का मैं पत्थर, तेरी राह से हटूंगा,
तन्हाई  के फलक पे , मैं खुद को तोलता हूँ  !

है इश्क की रिवायत, खुद ख़ाक में मिल जाना,
अंजाम जो हो सर-माथे, अब क्यों मैं सोचता हूँ !

है इश्क मुझे को तुझ से, तुझ से गिला ना कोई,
तेरे कल की फ़िक्र मुझ को, बस इतना सोचता हूँ  !

तेरे आज के अम्ल में, मैं तेरा कल देखता हूँ,
अंधों के नगर में मैं पागल, आईने बेचता हूँ  !
                                     ---अमर