Thursday, 5 January 2017
मैं बेचारा
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परछाइयों का मज़मा था, गुलज़ार नहीं हुआ,
मैं बदबख़्त नाशाद था, आबाद नहीं हुआ.
बेशर्मों ने नंगे हो कर बेचा ख़ुदको, चौक पे,
मेरा ख़रीदार नहीं मिला, मैं शर्मसार ही हुआ.
शाम ढले गुलज़ार हुए कोठे तो हुईं हैरानी,
मेरा तो इक घर था, वो क्यों वीरान ही हुआ.
मैंने कौन सी ऐसी बेज़ा इनायत की मांग की,
क्यों मेरी नहीं सुनी, क्यों मेरा काम नहीं हुआ.
चोट गहरी देस बेगाना, बताते भी तो किस को,
अपने ही कंधे पर रोना, कभी आसान नहीं हुआ .
हाक़िम ने मेरे हिस्से का सूरज भी पी लिया,
आबाद होने आया था मैं, बर्बाद ही हुआ .
-अमर
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यादें
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यक-ब-यक चलते चलते,
देखा जो पीछे मुड़ के,
कुछ वफायें रो रहीं थी,
कुछ रिश्ते सिसक रहे थे.
कुछ यकीन थे कतरा-कतरा,
कुछ अक़ीदतें पुर्ज़ा-पुर्ज़ा,
कुछ फूल जल रहे थे,
कुछ लम्हें सुलग रहे थे,
कुछ ख़्वाब बिख़र रहे थे,
कुछ वादे पलट रहे थे.
कुछ नामवर से चेहरे,
तेरे नाम में सिमट रहे थे,
कुछ पोशीदा से किस्से,
सड़क पे घिसट रहे थे.
कुछ सितारे थे मध्यम-मध्यम,
कुछ चाँद धुंधले-धुंधले,
थी तिशनगी बे-लिहाज सी,
तेरी अंजुमन में मरते मरते
लगी जो पैर पे ठोकर,
संभला मैं गिरते गिरते,
इक छन्न सी आवाज़ आयी,
कुछ तो जरूर फूटा,
दिल था या अना मेरी,
कुछ तो जरूर टूटा,
खोली जो गठरी ज़हन की ,
मन ही मन में डरते-डरते,
कुछ पाक़ीज़ा सी यादों ने ज़बरदस्ती......
सीली आखों में बसेरा कर लिया।
-- अमर
यक-ब-यक : अचानक
अक़ीदत : श्रद्धा
पोशीदा : गुप्त
तिशनगी : प्यास
अंजुमन : महफ़िल
अना : अहम्
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यक-ब-यक चलते चलते,
देखा जो पीछे मुड़ के,
कुछ वफायें रो रहीं थी,
कुछ रिश्ते सिसक रहे थे.
कुछ यकीन थे कतरा-कतरा,
कुछ अक़ीदतें पुर्ज़ा-पुर्ज़ा,
कुछ फूल जल रहे थे,
कुछ लम्हें सुलग रहे थे,
कुछ ख़्वाब बिख़र रहे थे,
कुछ वादे पलट रहे थे.
कुछ नामवर से चेहरे,
तेरे नाम में सिमट रहे थे,
कुछ पोशीदा से किस्से,
सड़क पे घिसट रहे थे.
कुछ सितारे थे मध्यम-मध्यम,
कुछ चाँद धुंधले-धुंधले,
थी तिशनगी बे-लिहाज सी,
तेरी अंजुमन में मरते मरते
लगी जो पैर पे ठोकर,
संभला मैं गिरते गिरते,
इक छन्न सी आवाज़ आयी,
कुछ तो जरूर फूटा,
दिल था या अना मेरी,
कुछ तो जरूर टूटा,
खोली जो गठरी ज़हन की ,
मन ही मन में डरते-डरते,
कुछ पाक़ीज़ा सी यादों ने ज़बरदस्ती......
सीली आखों में बसेरा कर लिया।
-- अमर
यक-ब-यक : अचानक
अक़ीदत : श्रद्धा
पोशीदा : गुप्त
तिशनगी : प्यास
अंजुमन : महफ़िल
अना : अहम्
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मिलना
मिलना छोड़ दिया उन सब से, जो किसी मतलब से मिलते थे,
उन्हें हम आज भी मिलते हैं, जिन्हें बस ! मिलने से मतलब है.
-अमर
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अब की बार
अब की बार तो हुस्न-ऐ-यार ने कमाल कर दिया,
ऐसा दिया ज़वाब के ला-ज़वाब कर दिया।
ख़ुद तो शाइस्ता है चौहदवीं के चाँद के मानिंद,
ऐसी लगाई आग के मुझे सूरज-मिसाल कर दिया।
इक वक्त था के खुश करता था मुस्कुरा के देख कर,
कर कर के नज़रअंदाज़ इस बार तो निहाल कर दिया।
क्या सलीके से डसा इस बार तो मेरे यार ने मुझे,
हक़ीक़त को मेरी पल में ख़्वार-ओ-ख़्वार कर दिया।
दीवाने से दीवाने के जीने की वजह ही छीन ली,
मरना तो मुश्किल था ही, जीना भी बवाल कर दिया।
-अमर
वो दिलबर
वो दिलबर जो दिल में बसा है, यूं समझिये ! थोड़ा सा बदगुमां है,
पर उस के बिना गुज़र भी कहाँ, उस जैसा दूजा कोई और कहाँ है।
रूठना-मनाना, फिर रूठना-फिर मनाना, फिर से रूठ जाना,
ये मुहब्बत की अजब सी वहशत उस के और मेरे दरमियाँ है।
इक इबादत ख़त्म, एक अलामत शुरू, ये कतार लंबी लगती है,
महबूब जाने या ख़ुदा जाने, ये कहां से कहां तक का सिलसिला है।
साथ चल रहे हैं दोनों के लम्हा-दर-लम्हा बस उम्र कट रही सारी,
यूं तो वही है रस्ता, वही हवा, वही फ़िज़ा, सब वैसे ही ग़मज़दा है।
-अमर
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राम करे !
राम करे !
परवरदिगार तुझ पर सदा मेहरबान रहे,
राम करे !
सब रूहें तेरी सोहबत की कद्रदान रहें ।
राम करे !
आँख तेरी कभी ना बरसे, ना झुके ,
राम करे !
तेरी खुशियों का खज़ाना कभी न चुके।
राम करे !
तेरे लफ़्ज़ सदा अपना जादू जगाते रहें,
राम करे !
सुनने वालों को तिलिस्म दिखाते रहें।
राम करे !
तू सारी दुनिया में मक़बूल हो जाये,
राम करे !
मेरी ये दुआ क़ुबूल हो जाये।
-- अमर
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