Thursday, 5 January 2017

अब की बार

अब की बार तो हुस्न-ऐ-यार ने कमाल कर दिया,
ऐसा दिया ज़वाब के ला-ज़वाब कर दिया।

ख़ुद तो शाइस्ता है चौहदवीं के चाँद के मानिंद,
ऐसी लगाई आग के मुझे सूरज-मिसाल कर दिया।
इक वक्त था के खुश करता था मुस्कुरा के देख कर,
कर कर के नज़रअंदाज़ इस बार तो निहाल कर दिया।
क्या सलीके से डसा इस बार तो मेरे यार ने मुझे,
हक़ीक़त को मेरी पल में ख़्वार-ओ-ख़्वार कर दिया।
दीवाने से दीवाने के जीने की वजह ही छीन ली,
मरना तो मुश्किल था ही, जीना भी बवाल कर दिया।
-अमर

वो दिलबर

वो दिलबर जो दिल में बसा है, यूं समझिये ! थोड़ा सा बदगुमां है,
पर उस के बिना गुज़र भी कहाँ, उस जैसा दूजा कोई और कहाँ है।
रूठना-मनाना, फिर रूठना-फिर मनाना, फिर से रूठ जाना,
ये मुहब्बत की अजब सी वहशत उस के और मेरे दरमियाँ है।
इक इबादत ख़त्म, एक अलामत शुरू, ये कतार लंबी लगती है,
महबूब जाने या ख़ुदा जाने, ये कहां से कहां तक का सिलसिला है।
साथ चल रहे हैं दोनों के लम्हा-दर-लम्हा बस उम्र कट रही सारी,
यूं तो वही है रस्ता, वही हवा, वही फ़िज़ा, सब वैसे ही ग़मज़दा है।
-अमर
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राम करे !

राम करे ! 
परवरदिगार तुझ पर सदा मेहरबान रहे,
राम करे ! 
सब रूहें तेरी सोहबत की कद्रदान रहें ।
राम करे ! 
आँख तेरी कभी ना बरसे, ना झुके ,
राम करे ! 
तेरी खुशियों का खज़ाना कभी न चुके।
राम करे ! 
तेरे लफ़्ज़ सदा अपना जादू जगाते रहें,
राम करे ! 
सुनने वालों को तिलिस्म दिखाते रहें।
राम करे ! 
तू सारी दुनिया में मक़बूल हो जाये,
राम करे ! 
मेरी ये दुआ क़ुबूल हो जाये।
-- अमर
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Sunday, 15 May 2016

बदनाम लड़कियां


कुछ बदनाम लड़कियां
जब मोहल्ले से चली जाती हैं काम पर
शरीफ लोग
तेज-तेज साँस लेते हैं....
शरीफ लड़कियां
मुंह ढककर चली आती हैं किसी चौराहे पर
जहाँ शरीफ लड़के उसका इंतज़ार करते हैं
लड़कियों को बैठ जाना होता है
बाइक के पिछली सीट पर
या लड़के खुद हाथ पकड़कर
उन्हें पार्क घुमा लाते हैं....
बदनाम लड़कियां लौटती है देर रात
ट्रैफिक पुलिस को गाली बकते हुए
तब तक शरीफ लड़कियां सो चुकी होती हैं
माँ-बाप का पैर छू कर
रात के तीसरे प्रहर में
शरीफ लड़कियों का मोबाइल घनघना उठता है....
तब बदनाम लड़कियां
पिला रही होती है बूढी माँ को पानी
बाप से बतिया रही होती है पेशन के लफड़े पर
छोटे भाई के पर्स में डाल रही होती है पैसे
सूखे पौधों पर तरस खाकर डाल देती है ढेर सारा पानी
बदनाम लड़कियां जब सोती हैं
बेहोश होती हैं ..
मोहल्ले के शरीफ लोग
डरते हैं बदनाम लड़कियों से
इसलिए वो छुपकर देखते हैं उन्हें
खिडकियों से झांकक..
अचानक सपने में देख लेती है वो घूरती हुए कुछ आँखें
उठकर देती है गालियाँ और बंद कर देती है खिड़की..
शरीफ लोग इन गालियों से बहुत डरते हैं
इन्हें पसंद है शरीफ लड़कियां
जो मुस्कुराकर उन्हें हाय बोलती हैं
इन्हीं शरीफ लड़कियों को जब पता चल जाती है
उनकी शराफत
शरीफ लड़कियां बदनाम होती हैं....
और ये लोग शरीफ के शरीफ रह जाते हैं
मैं शरीफों के मोहल्ले से बहुत डरती हूँ
क्योंकि वहां मेरी बेटी का बदनाम होना तय है..
उसकी माँ ने दे दी है हिदायत
अंकल से दूर रहना बेटा
बेटियां समझने लगी हैं अपने कच्ची उम्र से ही ये बातें
इन दिनों उनकी आँखों में भी एक डर देखती हूँ मैं.....!!
साभार - Aditi Gupta

Wednesday, 31 December 2014

जिंदगी के सफ़र में

जिंदगी के सफ़र में एक दिन मै कफ़न में सिल जाउंगी 
तब गुनगुना लेना गीत मेरे मै अल्फाज में मिल जाउंगी

लफ़्ज़ों से गर फूटे लावा तो तुम बिलकुल ना घबराना 
सुलगती चिंगारियों से तुम तब अपनी जीभ को नहलाना 
तब अंगारे बन कर फुटूगी जब आग को दे दिल जाउंगी
तब गुनगुना लेना गीत मेरे मै अल्फाज में मिल जाउंगी

लाल किले पर जब एक शख्स हर साल यूं ही बहकायेगा 
किसान का बेटा फिर यूँ ही दर- दर की ठोकरें खायेगा 
फिर हिला लेना जुबान अपनी मै भी संग हिल जाऊगी 
तब गुनगुना लेना गीत मेरे मै अल्फाज में मिल जाउंगी

जब रोटी चाँद सी लगने लगे तब ये सिर उठा लेना 
पेट पे बांधकर मोटी रस्सी और लाठी फिर उठा लेना 
और छील देना व्यवस्था को मै भी संग छिल जाउंगी 
तब गुनगुना लेना गीत मेरे मै अल्फाज में मिल जाउंगी

नौजवान खो गया है अब शराब के खुले आहतों में 
सोने की चिड़िया कैद हुई वेदेशी बैंको के खातों में 
घोटालों का हिसाब नहीं मै भी बिन रसीद बिल जाउंगी 
तब गुनगुना लेना गीत मेरे मै अल्फाज में मिल जाउंगी

सोने की चिड़िया ले आओ तब ही कुछ हो पायेगा 
चाहकर भी कोई मजदूर फिर भूखा न सो पायेगा 
मै भी किसी गरीब के महल में फूल बन खिल जाउंगी 
गुनगुना लेना गीत मेरे मै अल्फाजों में मिल जाउंगी

जिंदगी के सफ़र में एक दिन मै कफ़न में सिल जाउंगी 
तब गुनगुना लेना गीत मेरे मै अल्फाज में मिल जाउंगी

-- Aditi Gupta 

Sunday, 23 February 2014

पंजाबी छन्द १

वेख फरीदा मिटटी खुल्ली,मिटटी उत्ते मिटटी धुल्ली
मिटटी हँसे मिटटी रोवे,अंत मिटटी दा मिटटी होवे
ना कर बन्देया मेरी मेरी,ना ए तेरी ना ए मेरी
चार दिन दा मेला दुनिया, फेर मिटटी ते मिटटी दी ढेरी

~बाबा फरीद

चढ़दे सूरज ढल्दे वेखे, बुझे दिवे बल्दे वेखे
हीरे दा कोई मुल ना तारे, खोटे सिक्के चलदे वेखे
जीना दा ना जग ते कोई, ओ वि पुत्रर पलदे वेखे
ओहदी रहमत दे नाल , बन्दे पानी उत्ते चलदे वेखे
लोकी कहेंदे दाल ना गल्दी,मै ते पत्थर गल्दे वेखे

~ बुल्ले शाह जी.