Thursday, 15 August 2013


गीत गाता हूँ मै मौन के कंठ से,
है ये कोशिश की तुम याद आना नहीं,

दर्द के ईंट से प्रेम का घर बना,
यह मेरा घर है कोई ठिकाना नहीं।

रिश्ते है दाम के,लोग है नाम के,
अब हँसी की भी कीमत चुकाते है हम।

जानते है कि तुमसे बहुत दुर है,
पर तुम्ही को सुनाने को गाते है हम।

आना सब छोड़ कर,हर कसम तोड़ कर,
अब जो आना तो फिर कभी जाना नहीं।

..............सत्यम शिवम।

Friday, 31 May 2013

कुछ रिश्तें बहुत ख़ास होते है, रिश्तों के तथा-कथित सारे बंधनों से आज़ाद और बे-परवाह पर उन रिश्तों को किसी नाम-परिधि में रखना मुश्किल होता है लेकिन वही रिश्ते सबसे ज्यादा अजीज होतें है . यही अनाम रिश्ते किसी का व्यक्तिगत बेशकीमती सरमाया भी होता है और पूरी जिन्दगी का हासिल भी !

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             रिश्ते

रिश्ते ही रिश्ते,रिश्ते ही रिश्ते 
रिश्ते दर रिश्ते दर रिश्ते दर रिश्ते 
सुखों के रिश्ते, दुःखों के रिश्ते
हंसने के रिश्ते, रुलाने के रिश्ते 
पाने के रिश्ते, गंवाने के रिश्ते 
देने के रिश्ते, लेने के रिश्ते
सहने के रिश्ते, कहने के रिश्ते 
आरज़ू के रिश्ते, स्वभाव के रिश्ते 
ख्वाब के रिश्ते, रात के रिश्ते 
हिज्र के रिश्ते, वस्ल के रिश्ते
विरह के रिश्ते, सब्र के रिश्ते 
प्यार के रिश्ते, प्यास के रिश्ते 
पैसे के रिश्ते, जाने कैसे-कैसे रिश्ते
जन्म से ले कर मौत तक रिश्ते 
रिश्ते ही रिश्ते,रिश्ते ही रिश्ते 
रिश्ते दर रिश्ते दर रिश्ते दर रिश्ते 

तो भी मन का हंस अकेला !
- अमर

Thursday, 9 May 2013

जेहाद का दुधारा


सारी तबाहियों पर , है दस्तख़त हमारा ! "
सारे जहाँ से ऊपर , इस्लाम है हमारा .
दुनिया पे राज करना , ये काम है हमारा .
हम को नबी ने बख़्शी , इस्लाम से मुहब्बत ,
बाक़ी सभी से नफरत , ये फ़र्ज़ है हमारा .
क्या चीज़ हुब्बे वतनी? क्या है वतन परस्ती ?
मजहब सिवा किसी से , क्या वास्ता हमारा ?
जेहाद, जंगोदहशत , बारूद औ' धमाके ,
अल्लाह देख खुश है , ऊपर से ये नजारा .
या तो कबूल करले , इस्लाम सारी दुनिया ,
या ख़ाक कर दो इसको , ये है नबी का नारा .
हर शै' पे काफिरों की , हम मोमिनों का हक है ,
जोरू, जमीन, जेवर , हर माल है हमारा .
रहना जिसे सलामत , सुन्नत कबूल कर ले ,
इसके सिवा किसी का , हरगिज़ नहीं गुजारा .
जो भी उठाएगा सर , जाएगा वो जहन्नुम ,
आख़िर बजेगा हरसू , इस्लाम का नगारा .
ये ओम - क्रॉस क्या हैं ? सबको हटा-मिटा कर ,
चमकाएँगे फ़लक पर , हम अपना चाँदतारा .
है कुफ़्र जिक्रे - काशी , कैलासो - गंगा - जमना ,
हैं पाक सिर्फ जमजम , काबा , बलख , बुखारा .
मिस्मार कर दो मंदिर , बुत तोड़ डालो सारे ,
मुसलिम का काफ़िरों पर , हर वार हो करारा .
जितने जहाँ है खँडहर , वीरानियाँ जहाँ हैं ,
सारी तबाहियों पर , है दस्तख़त हमारा .
कहते किसे मुहब्बत ? इंसानियत क्या शै' है ?
मोमिन नहीं जो उससे , कब कैसा भाईचारा ?
मजहब हमें सिखाता , गैरों से बैर रखना ,
शरियत को काफ़िरों का , जीना नहीं गवारा .
समझो तो वक़्त रहते , इस सच को तुम समझ लो ,
वरना पड़ेगा सर पे , जेहाद का दुधारा .

आचार्य स्वामी श्री धर्मेंद्र महाराज

Monday, 11 March 2013

भले ही मुल्क के हालात में तब्दीलियाँ कम हों,
किसी सूरत गरीबों की मगर अब सिसकियाँ कम हों।

तरक्की ठीक है इसका ये मतलब तो नहीं लेकिन,
धुआँ हो, चिमनियाँ हों, फूल कम हों, तितलियाँ कम हों।

फिसलते ही फिसलते आ गए नाज़ुक मुहाने तक,
ज़रूरी है कि अब आगे से हमसे गल्तियाँ कम हों।

यही जो बेटियाँ हैं ये ही आख़िर कल की माँए हैं,
मिलें मुश्किल से कल माँए न इतनी बेटियाँ कम हों।

दिलों को भी तो अपना काम करने का मिले मौक़ा,
दिमागों ने जो पैदा की है शायद दूरियाँ कम हों।

अगर सचमुच तू दाता है कभी ऐसा भी कर ईश्वर,
तेरी खैरात ज्यादा हो हमारी झोलियाँ कम हों।

Guru Deep
सैयाँ गइलन बिदेस
पहुंचा के सजनी के मन के ठेस

टूटल-फूटल इंग्लिस सीख के,
फोनवा पर झाड़स उपदेश

सूट-बूट आ जूता पहिरस,
रहलन गाँव के गोबर-गनेस

फगुवा फेरु आ गईल,
जोगीरा जहजिया कब लौटी आपन देस ||

जोगीरा सा रा रा रा


सयान बेटवा के मति भईल भ्रष्ट,
घरे मचावे उत्पात
इज्जत माटी में मिला गईल,
सुने ना बडन के बात
उल्टा-सीधा सवाल करे,
समझे अपना के बाप
फगुवा फेरु आ गईल,
जोगीरा भंगवा से होखी इलाज ||
जोगीरा सा रा रा रा,

फागुन महिनवा आ गईल,
सबुनवा लगावे न कोय
रंग के ऊपर रंग चढ़े,
अंग-अंग संग भिगोय
फगुवा फेरु आ गईल,
जोगीरा लगे जैसे जंग होय ||
जोगीरा सा रा रा रा, कबीरा आ रा रा रा.....

पूस-अघन ना हम देखनी,
ना कवनो कार्तिक-कुआर
साल भर में जमा कईनी,
दुसमन दस हजार
कहीं बोली चले कहीं गोली,
सबके लगे हथियार
फगुवा फेरु आ गईल,
जोगीरा दुश्मनो लागे जैसन यार ||
जोगीरा सा रा रा रा
~~@vadhesh~~

Tuesday, 5 March 2013

अशार

गिरे हैं अर्श से फर्श पर ऐसे 
पता नहीं चला ऐसा हुआ कैसे 

आंखी 

Friday, 8 February 2013

मौन के कंठ से


गीत गाता हूँ मै मौन के कंठ से,
है ये कोशिश की तुम याद आना नहीं,

दर्द के ईंट से प्रेम का घर बना,
यह मेरा घर है कोई ठिकाना नहीं।

रिश्ते है दाम के,लोग है नाम के,
अब हँसी की भी कीमत चुकाते है हम।

जानते है कि तुमसे बहुत दुर है,
पर तुम्ही को सुनाने को गाते है हम।

आना सब छोड़ कर,हर कसम तोड़ कर,
अब जो आना तो फिर कभी जाना नहीं।

..............सत्यम शिवम।