सारी तबाहियों पर , है दस्तख़त हमारा ! "
सारे जहाँ से ऊपर , इस्लाम है हमारा .
दुनिया पे राज करना , ये काम है हमारा .
हम को नबी ने बख़्शी , इस्लाम से मुहब्बत ,
बाक़ी सभी से नफरत , ये फ़र्ज़ है हमारा .
क्या चीज़ हुब्बे वतनी? क्या है वतन परस्ती ?
मजहब सिवा किसी से , क्या वास्ता हमारा ?
जेहाद, जंगोदहशत , बारूद औ' धमाके ,
अल्लाह देख खुश है , ऊपर से ये नजारा .
या तो कबूल करले , इस्लाम सारी दुनिया ,
या ख़ाक कर दो इसको , ये है नबी का नारा .
हर शै' पे काफिरों की , हम मोमिनों का हक है ,
जोरू, जमीन, जेवर , हर माल है हमारा .
रहना जिसे सलामत , सुन्नत कबूल कर ले ,
इसके सिवा किसी का , हरगिज़ नहीं गुजारा .
जो भी उठाएगा सर , जाएगा वो जहन्नुम ,
आख़िर बजेगा हरसू , इस्लाम का नगारा .
ये ओम - क्रॉस क्या हैं ? सबको हटा-मिटा कर ,
चमकाएँगे फ़लक पर , हम अपना चाँदतारा .
है कुफ़्र जिक्रे - काशी , कैलासो - गंगा - जमना ,
हैं पाक सिर्फ जमजम , काबा , बलख , बुखारा .
मिस्मार कर दो मंदिर , बुत तोड़ डालो सारे ,
मुसलिम का काफ़िरों पर , हर वार हो करारा .
जितने जहाँ है खँडहर , वीरानियाँ जहाँ हैं ,
सारी तबाहियों पर , है दस्तख़त हमारा .
कहते किसे मुहब्बत ? इंसानियत क्या शै' है ?
मोमिन नहीं जो उससे , कब कैसा भाईचारा ?
मजहब हमें सिखाता , गैरों से बैर रखना ,
शरियत को काफ़िरों का , जीना नहीं गवारा .
समझो तो वक़्त रहते , इस सच को तुम समझ लो ,
वरना पड़ेगा सर पे , जेहाद का दुधारा .
आचार्य स्वामी श्री धर्मेंद्र महाराज