Wednesday, 31 December 2014

जिंदगी के सफ़र में

जिंदगी के सफ़र में एक दिन मै कफ़न में सिल जाउंगी 
तब गुनगुना लेना गीत मेरे मै अल्फाज में मिल जाउंगी

लफ़्ज़ों से गर फूटे लावा तो तुम बिलकुल ना घबराना 
सुलगती चिंगारियों से तुम तब अपनी जीभ को नहलाना 
तब अंगारे बन कर फुटूगी जब आग को दे दिल जाउंगी
तब गुनगुना लेना गीत मेरे मै अल्फाज में मिल जाउंगी

लाल किले पर जब एक शख्स हर साल यूं ही बहकायेगा 
किसान का बेटा फिर यूँ ही दर- दर की ठोकरें खायेगा 
फिर हिला लेना जुबान अपनी मै भी संग हिल जाऊगी 
तब गुनगुना लेना गीत मेरे मै अल्फाज में मिल जाउंगी

जब रोटी चाँद सी लगने लगे तब ये सिर उठा लेना 
पेट पे बांधकर मोटी रस्सी और लाठी फिर उठा लेना 
और छील देना व्यवस्था को मै भी संग छिल जाउंगी 
तब गुनगुना लेना गीत मेरे मै अल्फाज में मिल जाउंगी

नौजवान खो गया है अब शराब के खुले आहतों में 
सोने की चिड़िया कैद हुई वेदेशी बैंको के खातों में 
घोटालों का हिसाब नहीं मै भी बिन रसीद बिल जाउंगी 
तब गुनगुना लेना गीत मेरे मै अल्फाज में मिल जाउंगी

सोने की चिड़िया ले आओ तब ही कुछ हो पायेगा 
चाहकर भी कोई मजदूर फिर भूखा न सो पायेगा 
मै भी किसी गरीब के महल में फूल बन खिल जाउंगी 
गुनगुना लेना गीत मेरे मै अल्फाजों में मिल जाउंगी

जिंदगी के सफ़र में एक दिन मै कफ़न में सिल जाउंगी 
तब गुनगुना लेना गीत मेरे मै अल्फाज में मिल जाउंगी

-- Aditi Gupta 

Sunday, 23 February 2014

पंजाबी छन्द १

वेख फरीदा मिटटी खुल्ली,मिटटी उत्ते मिटटी धुल्ली
मिटटी हँसे मिटटी रोवे,अंत मिटटी दा मिटटी होवे
ना कर बन्देया मेरी मेरी,ना ए तेरी ना ए मेरी
चार दिन दा मेला दुनिया, फेर मिटटी ते मिटटी दी ढेरी

~बाबा फरीद

चढ़दे सूरज ढल्दे वेखे, बुझे दिवे बल्दे वेखे
हीरे दा कोई मुल ना तारे, खोटे सिक्के चलदे वेखे
जीना दा ना जग ते कोई, ओ वि पुत्रर पलदे वेखे
ओहदी रहमत दे नाल , बन्दे पानी उत्ते चलदे वेखे
लोकी कहेंदे दाल ना गल्दी,मै ते पत्थर गल्दे वेखे

~ बुल्ले शाह जी.

Saturday, 22 February 2014

देश क्या है ????

बलात्कार से सहमी लड़कियों की चीख़ है?
मंदिर, मस्ज़िद, गुरूद्वारे में बँट रही भीख़ है?
लद्दाख में ठिठुरता जवान है, या,
कश्मीर मांगता हुआ हिन्दू - मुस्लमान है?

सिनेमा में तालियां बजाने वाली मासूमियत है?
किताबों में बेची गई झूठी हक़ीक़त है?
जन गण मन पर झूमता हुआ जन समूह है, या,
व्यवस्था में कुचली गयी बेबस रूह है?

Train में मूँगफली फेंककर
अमरीका की सफ़ाई पर चर्चा करना देश है?
सब कुछ देखकर आँखें बंद कर लेना देश है?
अपने परिवार का पेट पालना देश है, या,
देश पर बैठकर घंटो विचार करना देश है?

देश तुम हो, देश मैं हूँ, देश हम हैं
देश परिभाषाओं की जागीर नहीं,
देश इंसानियत सँभालने का ढाँचा है
देश तुम हो, देश मैं हूँ, देश हम हैं

अज्ञात

Sunday, 29 December 2013

Answer to Munnavar Rana

lines of "Munnavar Rana" about the deep pain of Muslims who left India & moved to Pakistan in the 1947 partition.


मुहाजिर हैं मगर हम एक दुनिया छोड़ आए हैं,
तुम्हारे पास जितना है हम उतना छोड़ आए हैं ।
कहानी का ये हिस्सा आज तक सब से छुपाया है,
कि हम मिट्टी की ख़ातिर अपना सोना छोड़ आए हैं ।


नई दुनिया बसा लेने की इक कमज़ोर चाहत में,
पुराने घर की दहलीज़ों को सूना छोड़ आए हैं ।
अक़ीदत से कलाई पर जो इक बच्ची ने बाँधी थी,
वो राखी छोड़ आए हैं वो रिश्ता छोड़ आए हैं ।


किसी की आरज़ू के पाँवों में ज़ंजीर डाली थी,
किसी की ऊन की तीली में फंदा छोड़ आए हैं ।
पकाकर रोटियाँ रखती थी माँ जिसमें सलीक़े से,
निकलते वक़्त वो रोटी की डलिया छोड़ आए हैं ।


जो इक पतली सड़क उन्नाव से मोहान जाती है,
वहीं हसरत के ख़्वाबों को भटकता छोड़ आए हैं ।
यक़ीं आता नहीं, लगता है कच्ची नींद में शायद,
हम अपना घर गली अपना मोहल्ला छोड़ आए हैं ।


हमारे लौट आने की दुआएँ करता रहता है,
हम अपनी छत पे जो चिड़ियों का जत्था छोड़ आए हैं ।
हमें हिजरत की इस अन्धी गुफ़ा में याद आता है,
अजन्ता छोड़ आए हैं एलोरा छोड़ आए हैं ।


सभी त्योहार मिलजुल कर मनाते थे वहाँ जब थे,
दिवाली छोड़ आए हैं दशहरा छोड़ आए हैं ।
हमें सूरज की किरनें इस लिए तक़लीफ़ देती हैं,
अवध की शाम काशी का सवेरा छोड़ आए हैं ।


गले मिलती हुई नदियाँ गले मिलते हुए मज़हब,
इलाहाबाद में कैसा नज़ारा छोड़ आए हैं ।
हम अपने साथ तस्वीरें तो ले आए हैं शादी की,
किसी शायर ने लिक्खा था जो सेहरा छोड़ आए हैं ।


कई आँखें अभी तक ये शिकायत करती रहती हैं,
के हम बहते हुए काजल का दरिया छोड़ आए हैं ।
शक्कर इस जिस्म से खिलवाड़ करना कैसे छोड़ेगी,
के हम जामुन के पेड़ों को अकेला छोड़ आए हैं ।


वो बरगद जिसके पेड़ों से महक आती थी फूलों की,
उसी बरगद में एक हरियल का जोड़ा छोड़ आए हैं ।
अभी तक बारिसों में भीगते ही याद आता है,
के छप्पर के नीचे अपना छाता छोड़ आए हैं ।


भतीजी अब सलीके से दुपट्टा ओढ़ती होगी,
वही झूले में हम जिसको हुमड़ता छोड़ आए हैं ।
ये हिजरत तो नहीं थी बुजदिली शायद हमारी थी,
के हम बिस्तर में एक हड्डी का ढाचा छोड़ आए हैं ।


हमारी अहलिया तो आ गयी माँ छुट गए आखिर,
के हम पीतल उठा लाये हैं सोना छोड़ आए हैं ।
महीनो तक तो अम्मी ख्वाब में भी बुदबुदाती थीं,
सुखाने के लिए छत पर पुदीना छोड़ आए हैं ।


वजारत भी हमारे वास्ते कम मर्तबा होगी,
हम अपनी माँ के हाथों में निवाला छोड़ आए हैं ।
यहाँ आते हुए हर कीमती सामान ले आए,
मगर इकबाल का लिखा तराना छोड़ आए हैं ।


हिमालय से निकलती हर नदी आवाज़ देती थी,
मियां आओ वजू कर लो ये जूमला छोड़ आए हैं ।
वजू करने को जब भी बैठते हैं याद आता है,
के हम जल्दी में जमुना का किनारा छोड़ आए हैं ।


उतार आये मुरव्वत और रवादारी का हर चोला,
जो एक साधू ने पहनाई थी माला छोड़ आए हैं ।
जनाबे मीर का दीवान तो हम साथ ले आये,
मगर हम मीर के माथे का कश्का छोड़ आए हैं ।


उधर का कोई मिल जाए इधर तो हम यही पूछें,
हम आँखे छोड़ आये हैं के चश्मा छोड़ आए हैं ।
हमारी रिश्तेदारी तो नहीं थी हाँ ताल्लुक था,
जो लक्ष्मी छोड़ आये हैं जो दुर्गा छोड़ आए हैं ।


गले मिलती हुई नदियाँ गले मिलते हुए मज़हब,
इलाहाबाद में कैसा नाज़ारा छोड़ आए हैं ।
कल एक अमरुद वाले से ये कहना गया हमको,
जहां से आये हैं हम इसकी बगिया छोड़ आए हैं ।


वो हैरत से हमे तकता रहा कुछ देर फिर बोला,
वो संगम का इलाका छुट गया या छोड़ आए हैं ।
अभी हम सोच में गुम थे के उससे क्या कहा जाए,
हमारे आन्सुयों ने राज खोला छोड़ आए हैं ।


मुहर्रम में हमारा लखनऊ इरान लगता था,
मदद मौला हुसैनाबाद रोता छोड़ आए हैं ।
जो एक पतली सड़क उन्नाव से मोहान जाती है,
वहीँ हसरत के ख्वाबों को भटकता छोड़ आए हैं ।


महल से दूर बरगद के तलए मवान के खातिर,
थके हारे हुए गौतम को बैठा छोड़ आए हैं ।
तसल्ली को कोई कागज़ भी चिपका नहीं पाए,
चरागे दिल का शीशा यूँ ही चटखा छोड़ आए हैं ।


सड़क भी शेरशाही आ गयी तकसीम के जद मे,
तुझे करके हिन्दुस्तान छोटा छोड़ आए हैं ।
हसीं आती है अपनी अदाकारी पर खुद हमको,
बने फिरते हैं युसूफ और जुलेखा छोड़ आए हैं ।


गुजरते वक़्त बाज़ारों में अब भी याद आता है,
किसी को उसके कमरे में संवरता छोड़ आए हैं ।
हमारा रास्ता तकते हुए पथरा गयी होंगी,
वो आँखे जिनको हम खिड़की पे रखा छोड़ आए हैं ।


तू हमसे चाँद इतनी बेरुखी से बात करता है
हम अपनी झील में एक चाँद उतरा छोड़ आए हैं ।
ये दो कमरों का घर और ये सुलगती जिंदगी अपनी,
वहां इतना बड़ा नौकर का कमरा छोड़ आए हैं ।


हमे मरने से पहले सबको ये ताकीद करना है ,
किसी को मत बता देना कि क्या-क्या छोड़ आए हैं ।


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Answer of someone who is seeing the future now...

नहीं जनाब आप जन्नत की चाहत में 
मुल्क की छाती पे सदा सड़ता हुआ घाव छोड़ आए हैं

अब क्यों रोते हैं जो जहन्नुम को रहते हैं 
जो सच में जन्नत था उसे तो तोड़ आए हैं

आंखी

Thursday, 15 August 2013

उस दिन

मंदिर की सीढियों पर एक भी भूखा, जिस दिन मेरी राह ना रोकेगा,
१५ अगस्त के दिन कोई बच्चा जब ट्राफिक सिग्नल पे तिरंगे ना बेचेगा,
उस दिन स्वतंत्रता-दिवस मैं मनाउं

सिटी-बस में ”महिला आरक्षित” सीट पे मैं जिस दिन बेठुंगी ,
जेवर लदी रात को घर सुरक्षित मैं जिस दिन लौटूंगी,
उस दिन स्वतंत्रता-दिवस मैं मनाउं

मेरा सरकारी काम जिस दिन बिना खिलाये निबट जायेगा ,
कोर्ट-केस अगर जो मेरे जीते-जी सुलझ जायेगा ,
उस दिन स्वतंत्रता-दिवस मैं मनाउं

सारे न्यूज़ चैनल जिस दिन अतिशियुक्त खबरें ना सुनायेंगे ,
उ .प. , बिहार जिस दिन बिना दहेज़ बेटी बिहायेंगे,
उस दिन स्वतंत्रता-दिवस मैं मनाउं

कागज़ पर जिस दिन हर अंगूठा हस्ताक्षर करेगा,
फंसी की सजा से जिस दिन हर बलात्कारी डरेगा,
उस दिन स्वतंत्रता-दिवस मैं मनाउं

सारे रिश्वतखोर जिस दिन सस्पेंड किये जायेंगे ,
मंत्री बनने के लिए जिस दिन एंट्रेंस ऐक्साम लिए जायेंगे ,
उस दिन स्वतंत्रता-दिवस मैं मनाउं

अमरीका के लोग जिस दिन पैसा कमाने भारत आएंगे ,
नासा से भारतीय वैज्ञानिक जिस दिन वापस बुलाये जायेंगे ,
उस दिन स्वतंत्रता-दिवस मैं मनाउं

शिक्षा के नाम पे कोई छात्र ना जिस दिन स्यूसाइड करेगा ,
अमर सैनिक की विधवा को जिस दिन नियमित भत्ता मिलेगा ,
उस दिन स्वतंत्रता-दिवस मैं मनाउं

आतंकवाद से जिस दिन ना मैं घबरऊं
कश्मीर की वादियों में निर्भय जिस दिन घूम आउं,
उस दिन स्वतंत्रता-दिवस मैं ..


DHANISHTHA

साबरमती के सन्त के अनोखे कमाल

दे दी हमें बरबादी चली कैसी चतुर चाल?
साबरमती के सन्त तूने कर दीया कमाल.

उन्नीस सौ इक्कीस में असहयोग का फरमान,
गान्धी ने कीया जारी तो िहन्दू औ मुसलमान.
घर से नीकल पड़े थे हथेली पे लीये जान,
बाइस में चौरीचौरा में भड़के कई कीसान.
थाने को दीया फूँक तो गान्धी हुए बेहाल,
साबरमती के सन्त तूने कर दीया कमाल.


गान्धी ने कीया रद्द असहयोग का ऐलान,
यह देख भड़क उट्ठे कई लाख नौजवान,
बीस्मील ने लीखा इसपे-ये कैसा है महात्मा!
अंग्रेजों से डरती है सदा जीसकी आत्मा.
नीकला जो इश्तहार वो सचमुच था बेमीसाल,
साबरमती के सन्त तूने कर दीया कमाल.


पैसे की जरूरत थी बड़े काम के लीये,
लोगों की जरूरत थी इन्तजाम के लीये,
बीस्मील ने नौजवान इकट्ठे कई कीये,
छप्पन जीलों में संगठक तैनात कर दीये.
फीर लूट लीया एक दीन सरकार का ही माल,
साबरमती के सन्त तूने कर दीया कमाल.


चालीस गीरफ्तार हुए जेल में गये,
कुछ भेदीये भी बन के इसी खेल में गये,
पेशी हुई तो जज से कहा मेल में गये,
हम भी हुजूर चढ़ के उसी रेल में गये.
उनमें बनारसी भी था गान्धी का यक दलाल,
साबरमती के सन्त तूने कर दीया कमाल.


उसने कीया अप्रूव ये सरकारी खजाना,
बीस्मील ने ही लूटा है वो डाकू है पुराना,
गर छोड़ दीया उसको तो रोयेगा ज़माना,
फाँसी लगा के ख़त्म करो उसका फ़साना.
वरना वो मचायेगा दुबारा वही बबाल.
साबरमती के सन्त तूने कर दीया कमाल.


बीस्मील के साथ तीन और दार पर चढ़े,
जज्वा ये उनका देख नौजवान सब बढे,
सांडर्सका वध करके भगत सींह नीकल पड़े,
बम फोड़ने असेम्बली की ओर चल पड़े.
बम फोड़ के पर्चों को हवा में दीया उछाल.
साबरमती के सन्त तूने कर दीया कमाल.


इस सबकी सजा मौत भगत सींह को मीली,
जनता ने बहुत चाहा पे फाँसी नहीं टली,
इरवीन से हुआ पैक्ट तो चर्चा वहाँ चली,
गान्धी ने कहा दे दो अभी देर ना भली.
वरना ये कराँची में उठायेंगे फीर सवाल.
साबरमती के सन्त तूने कर दीया कमाल.


जब हरीपुरा चुनाव में गान्धी को मीली मात,
दोबारा से त्रीपुरी में हुई फीर ये करामात,
इस पर सवाल कार्यसमीती में ये उठाया,
गान्धी ने कहा फीर से इसे कीसने जीताया?
या तो इसे नीकालो या फीर दो मुझे नीकाल.
साबरमती के सन्त तूने कर दीया कमाल.


इस पर सुभाष कांग्रेस से नीकल गये,
जीन्दा मशाल बन के अपने आप जल गये,
बदकीस्मती से जंग में जापान गया हार,
मारे गये सुभाष ये करवा के दुष्प्रचार,
नेहरू के लीये कर दीया अम्नो-अमन बहाल.
साबरमती के सन्त तूने कर दीया कमाल.


आखीर में जब अंग्रेज गये घर से नीकाले,
था ये सवाल कौन सीयासत को सम्हाले,
जीन्ना की जीद थी मुल्क करो उनके हवाले,
उस ओर जवाहर के थे अन्दाज नीराले.
बँटवारा करके मुल्क में नफरत का बुना जाल.
साबरमती के सन्त तूने कर दीया कमाल...!!