Sunday, 29 December 2013

Answer to Munnavar Rana

lines of "Munnavar Rana" about the deep pain of Muslims who left India & moved to Pakistan in the 1947 partition.


मुहाजिर हैं मगर हम एक दुनिया छोड़ आए हैं,
तुम्हारे पास जितना है हम उतना छोड़ आए हैं ।
कहानी का ये हिस्सा आज तक सब से छुपाया है,
कि हम मिट्टी की ख़ातिर अपना सोना छोड़ आए हैं ।


नई दुनिया बसा लेने की इक कमज़ोर चाहत में,
पुराने घर की दहलीज़ों को सूना छोड़ आए हैं ।
अक़ीदत से कलाई पर जो इक बच्ची ने बाँधी थी,
वो राखी छोड़ आए हैं वो रिश्ता छोड़ आए हैं ।


किसी की आरज़ू के पाँवों में ज़ंजीर डाली थी,
किसी की ऊन की तीली में फंदा छोड़ आए हैं ।
पकाकर रोटियाँ रखती थी माँ जिसमें सलीक़े से,
निकलते वक़्त वो रोटी की डलिया छोड़ आए हैं ।


जो इक पतली सड़क उन्नाव से मोहान जाती है,
वहीं हसरत के ख़्वाबों को भटकता छोड़ आए हैं ।
यक़ीं आता नहीं, लगता है कच्ची नींद में शायद,
हम अपना घर गली अपना मोहल्ला छोड़ आए हैं ।


हमारे लौट आने की दुआएँ करता रहता है,
हम अपनी छत पे जो चिड़ियों का जत्था छोड़ आए हैं ।
हमें हिजरत की इस अन्धी गुफ़ा में याद आता है,
अजन्ता छोड़ आए हैं एलोरा छोड़ आए हैं ।


सभी त्योहार मिलजुल कर मनाते थे वहाँ जब थे,
दिवाली छोड़ आए हैं दशहरा छोड़ आए हैं ।
हमें सूरज की किरनें इस लिए तक़लीफ़ देती हैं,
अवध की शाम काशी का सवेरा छोड़ आए हैं ।


गले मिलती हुई नदियाँ गले मिलते हुए मज़हब,
इलाहाबाद में कैसा नज़ारा छोड़ आए हैं ।
हम अपने साथ तस्वीरें तो ले आए हैं शादी की,
किसी शायर ने लिक्खा था जो सेहरा छोड़ आए हैं ।


कई आँखें अभी तक ये शिकायत करती रहती हैं,
के हम बहते हुए काजल का दरिया छोड़ आए हैं ।
शक्कर इस जिस्म से खिलवाड़ करना कैसे छोड़ेगी,
के हम जामुन के पेड़ों को अकेला छोड़ आए हैं ।


वो बरगद जिसके पेड़ों से महक आती थी फूलों की,
उसी बरगद में एक हरियल का जोड़ा छोड़ आए हैं ।
अभी तक बारिसों में भीगते ही याद आता है,
के छप्पर के नीचे अपना छाता छोड़ आए हैं ।


भतीजी अब सलीके से दुपट्टा ओढ़ती होगी,
वही झूले में हम जिसको हुमड़ता छोड़ आए हैं ।
ये हिजरत तो नहीं थी बुजदिली शायद हमारी थी,
के हम बिस्तर में एक हड्डी का ढाचा छोड़ आए हैं ।


हमारी अहलिया तो आ गयी माँ छुट गए आखिर,
के हम पीतल उठा लाये हैं सोना छोड़ आए हैं ।
महीनो तक तो अम्मी ख्वाब में भी बुदबुदाती थीं,
सुखाने के लिए छत पर पुदीना छोड़ आए हैं ।


वजारत भी हमारे वास्ते कम मर्तबा होगी,
हम अपनी माँ के हाथों में निवाला छोड़ आए हैं ।
यहाँ आते हुए हर कीमती सामान ले आए,
मगर इकबाल का लिखा तराना छोड़ आए हैं ।


हिमालय से निकलती हर नदी आवाज़ देती थी,
मियां आओ वजू कर लो ये जूमला छोड़ आए हैं ।
वजू करने को जब भी बैठते हैं याद आता है,
के हम जल्दी में जमुना का किनारा छोड़ आए हैं ।


उतार आये मुरव्वत और रवादारी का हर चोला,
जो एक साधू ने पहनाई थी माला छोड़ आए हैं ।
जनाबे मीर का दीवान तो हम साथ ले आये,
मगर हम मीर के माथे का कश्का छोड़ आए हैं ।


उधर का कोई मिल जाए इधर तो हम यही पूछें,
हम आँखे छोड़ आये हैं के चश्मा छोड़ आए हैं ।
हमारी रिश्तेदारी तो नहीं थी हाँ ताल्लुक था,
जो लक्ष्मी छोड़ आये हैं जो दुर्गा छोड़ आए हैं ।


गले मिलती हुई नदियाँ गले मिलते हुए मज़हब,
इलाहाबाद में कैसा नाज़ारा छोड़ आए हैं ।
कल एक अमरुद वाले से ये कहना गया हमको,
जहां से आये हैं हम इसकी बगिया छोड़ आए हैं ।


वो हैरत से हमे तकता रहा कुछ देर फिर बोला,
वो संगम का इलाका छुट गया या छोड़ आए हैं ।
अभी हम सोच में गुम थे के उससे क्या कहा जाए,
हमारे आन्सुयों ने राज खोला छोड़ आए हैं ।


मुहर्रम में हमारा लखनऊ इरान लगता था,
मदद मौला हुसैनाबाद रोता छोड़ आए हैं ।
जो एक पतली सड़क उन्नाव से मोहान जाती है,
वहीँ हसरत के ख्वाबों को भटकता छोड़ आए हैं ।


महल से दूर बरगद के तलए मवान के खातिर,
थके हारे हुए गौतम को बैठा छोड़ आए हैं ।
तसल्ली को कोई कागज़ भी चिपका नहीं पाए,
चरागे दिल का शीशा यूँ ही चटखा छोड़ आए हैं ।


सड़क भी शेरशाही आ गयी तकसीम के जद मे,
तुझे करके हिन्दुस्तान छोटा छोड़ आए हैं ।
हसीं आती है अपनी अदाकारी पर खुद हमको,
बने फिरते हैं युसूफ और जुलेखा छोड़ आए हैं ।


गुजरते वक़्त बाज़ारों में अब भी याद आता है,
किसी को उसके कमरे में संवरता छोड़ आए हैं ।
हमारा रास्ता तकते हुए पथरा गयी होंगी,
वो आँखे जिनको हम खिड़की पे रखा छोड़ आए हैं ।


तू हमसे चाँद इतनी बेरुखी से बात करता है
हम अपनी झील में एक चाँद उतरा छोड़ आए हैं ।
ये दो कमरों का घर और ये सुलगती जिंदगी अपनी,
वहां इतना बड़ा नौकर का कमरा छोड़ आए हैं ।


हमे मरने से पहले सबको ये ताकीद करना है ,
किसी को मत बता देना कि क्या-क्या छोड़ आए हैं ।


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Answer of someone who is seeing the future now...

नहीं जनाब आप जन्नत की चाहत में 
मुल्क की छाती पे सदा सड़ता हुआ घाव छोड़ आए हैं

अब क्यों रोते हैं जो जहन्नुम को रहते हैं 
जो सच में जन्नत था उसे तो तोड़ आए हैं

आंखी

Thursday, 15 August 2013

उस दिन

मंदिर की सीढियों पर एक भी भूखा, जिस दिन मेरी राह ना रोकेगा,
१५ अगस्त के दिन कोई बच्चा जब ट्राफिक सिग्नल पे तिरंगे ना बेचेगा,
उस दिन स्वतंत्रता-दिवस मैं मनाउं

सिटी-बस में ”महिला आरक्षित” सीट पे मैं जिस दिन बेठुंगी ,
जेवर लदी रात को घर सुरक्षित मैं जिस दिन लौटूंगी,
उस दिन स्वतंत्रता-दिवस मैं मनाउं

मेरा सरकारी काम जिस दिन बिना खिलाये निबट जायेगा ,
कोर्ट-केस अगर जो मेरे जीते-जी सुलझ जायेगा ,
उस दिन स्वतंत्रता-दिवस मैं मनाउं

सारे न्यूज़ चैनल जिस दिन अतिशियुक्त खबरें ना सुनायेंगे ,
उ .प. , बिहार जिस दिन बिना दहेज़ बेटी बिहायेंगे,
उस दिन स्वतंत्रता-दिवस मैं मनाउं

कागज़ पर जिस दिन हर अंगूठा हस्ताक्षर करेगा,
फंसी की सजा से जिस दिन हर बलात्कारी डरेगा,
उस दिन स्वतंत्रता-दिवस मैं मनाउं

सारे रिश्वतखोर जिस दिन सस्पेंड किये जायेंगे ,
मंत्री बनने के लिए जिस दिन एंट्रेंस ऐक्साम लिए जायेंगे ,
उस दिन स्वतंत्रता-दिवस मैं मनाउं

अमरीका के लोग जिस दिन पैसा कमाने भारत आएंगे ,
नासा से भारतीय वैज्ञानिक जिस दिन वापस बुलाये जायेंगे ,
उस दिन स्वतंत्रता-दिवस मैं मनाउं

शिक्षा के नाम पे कोई छात्र ना जिस दिन स्यूसाइड करेगा ,
अमर सैनिक की विधवा को जिस दिन नियमित भत्ता मिलेगा ,
उस दिन स्वतंत्रता-दिवस मैं मनाउं

आतंकवाद से जिस दिन ना मैं घबरऊं
कश्मीर की वादियों में निर्भय जिस दिन घूम आउं,
उस दिन स्वतंत्रता-दिवस मैं ..


DHANISHTHA

साबरमती के सन्त के अनोखे कमाल

दे दी हमें बरबादी चली कैसी चतुर चाल?
साबरमती के सन्त तूने कर दीया कमाल.

उन्नीस सौ इक्कीस में असहयोग का फरमान,
गान्धी ने कीया जारी तो िहन्दू औ मुसलमान.
घर से नीकल पड़े थे हथेली पे लीये जान,
बाइस में चौरीचौरा में भड़के कई कीसान.
थाने को दीया फूँक तो गान्धी हुए बेहाल,
साबरमती के सन्त तूने कर दीया कमाल.


गान्धी ने कीया रद्द असहयोग का ऐलान,
यह देख भड़क उट्ठे कई लाख नौजवान,
बीस्मील ने लीखा इसपे-ये कैसा है महात्मा!
अंग्रेजों से डरती है सदा जीसकी आत्मा.
नीकला जो इश्तहार वो सचमुच था बेमीसाल,
साबरमती के सन्त तूने कर दीया कमाल.


पैसे की जरूरत थी बड़े काम के लीये,
लोगों की जरूरत थी इन्तजाम के लीये,
बीस्मील ने नौजवान इकट्ठे कई कीये,
छप्पन जीलों में संगठक तैनात कर दीये.
फीर लूट लीया एक दीन सरकार का ही माल,
साबरमती के सन्त तूने कर दीया कमाल.


चालीस गीरफ्तार हुए जेल में गये,
कुछ भेदीये भी बन के इसी खेल में गये,
पेशी हुई तो जज से कहा मेल में गये,
हम भी हुजूर चढ़ के उसी रेल में गये.
उनमें बनारसी भी था गान्धी का यक दलाल,
साबरमती के सन्त तूने कर दीया कमाल.


उसने कीया अप्रूव ये सरकारी खजाना,
बीस्मील ने ही लूटा है वो डाकू है पुराना,
गर छोड़ दीया उसको तो रोयेगा ज़माना,
फाँसी लगा के ख़त्म करो उसका फ़साना.
वरना वो मचायेगा दुबारा वही बबाल.
साबरमती के सन्त तूने कर दीया कमाल.


बीस्मील के साथ तीन और दार पर चढ़े,
जज्वा ये उनका देख नौजवान सब बढे,
सांडर्सका वध करके भगत सींह नीकल पड़े,
बम फोड़ने असेम्बली की ओर चल पड़े.
बम फोड़ के पर्चों को हवा में दीया उछाल.
साबरमती के सन्त तूने कर दीया कमाल.


इस सबकी सजा मौत भगत सींह को मीली,
जनता ने बहुत चाहा पे फाँसी नहीं टली,
इरवीन से हुआ पैक्ट तो चर्चा वहाँ चली,
गान्धी ने कहा दे दो अभी देर ना भली.
वरना ये कराँची में उठायेंगे फीर सवाल.
साबरमती के सन्त तूने कर दीया कमाल.


जब हरीपुरा चुनाव में गान्धी को मीली मात,
दोबारा से त्रीपुरी में हुई फीर ये करामात,
इस पर सवाल कार्यसमीती में ये उठाया,
गान्धी ने कहा फीर से इसे कीसने जीताया?
या तो इसे नीकालो या फीर दो मुझे नीकाल.
साबरमती के सन्त तूने कर दीया कमाल.


इस पर सुभाष कांग्रेस से नीकल गये,
जीन्दा मशाल बन के अपने आप जल गये,
बदकीस्मती से जंग में जापान गया हार,
मारे गये सुभाष ये करवा के दुष्प्रचार,
नेहरू के लीये कर दीया अम्नो-अमन बहाल.
साबरमती के सन्त तूने कर दीया कमाल.


आखीर में जब अंग्रेज गये घर से नीकाले,
था ये सवाल कौन सीयासत को सम्हाले,
जीन्ना की जीद थी मुल्क करो उनके हवाले,
उस ओर जवाहर के थे अन्दाज नीराले.
बँटवारा करके मुल्क में नफरत का बुना जाल.
साबरमती के सन्त तूने कर दीया कमाल...!!

गीत गाता हूँ मै मौन के कंठ से,
है ये कोशिश की तुम याद आना नहीं,

दर्द के ईंट से प्रेम का घर बना,
यह मेरा घर है कोई ठिकाना नहीं।

रिश्ते है दाम के,लोग है नाम के,
अब हँसी की भी कीमत चुकाते है हम।

जानते है कि तुमसे बहुत दुर है,
पर तुम्ही को सुनाने को गाते है हम।

आना सब छोड़ कर,हर कसम तोड़ कर,
अब जो आना तो फिर कभी जाना नहीं।

..............सत्यम शिवम।

Friday, 31 May 2013

कुछ रिश्तें बहुत ख़ास होते है, रिश्तों के तथा-कथित सारे बंधनों से आज़ाद और बे-परवाह पर उन रिश्तों को किसी नाम-परिधि में रखना मुश्किल होता है लेकिन वही रिश्ते सबसे ज्यादा अजीज होतें है . यही अनाम रिश्ते किसी का व्यक्तिगत बेशकीमती सरमाया भी होता है और पूरी जिन्दगी का हासिल भी !

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             रिश्ते

रिश्ते ही रिश्ते,रिश्ते ही रिश्ते 
रिश्ते दर रिश्ते दर रिश्ते दर रिश्ते 
सुखों के रिश्ते, दुःखों के रिश्ते
हंसने के रिश्ते, रुलाने के रिश्ते 
पाने के रिश्ते, गंवाने के रिश्ते 
देने के रिश्ते, लेने के रिश्ते
सहने के रिश्ते, कहने के रिश्ते 
आरज़ू के रिश्ते, स्वभाव के रिश्ते 
ख्वाब के रिश्ते, रात के रिश्ते 
हिज्र के रिश्ते, वस्ल के रिश्ते
विरह के रिश्ते, सब्र के रिश्ते 
प्यार के रिश्ते, प्यास के रिश्ते 
पैसे के रिश्ते, जाने कैसे-कैसे रिश्ते
जन्म से ले कर मौत तक रिश्ते 
रिश्ते ही रिश्ते,रिश्ते ही रिश्ते 
रिश्ते दर रिश्ते दर रिश्ते दर रिश्ते 

तो भी मन का हंस अकेला !
- अमर

Thursday, 9 May 2013

जेहाद का दुधारा


सारी तबाहियों पर , है दस्तख़त हमारा ! "
सारे जहाँ से ऊपर , इस्लाम है हमारा .
दुनिया पे राज करना , ये काम है हमारा .
हम को नबी ने बख़्शी , इस्लाम से मुहब्बत ,
बाक़ी सभी से नफरत , ये फ़र्ज़ है हमारा .
क्या चीज़ हुब्बे वतनी? क्या है वतन परस्ती ?
मजहब सिवा किसी से , क्या वास्ता हमारा ?
जेहाद, जंगोदहशत , बारूद औ' धमाके ,
अल्लाह देख खुश है , ऊपर से ये नजारा .
या तो कबूल करले , इस्लाम सारी दुनिया ,
या ख़ाक कर दो इसको , ये है नबी का नारा .
हर शै' पे काफिरों की , हम मोमिनों का हक है ,
जोरू, जमीन, जेवर , हर माल है हमारा .
रहना जिसे सलामत , सुन्नत कबूल कर ले ,
इसके सिवा किसी का , हरगिज़ नहीं गुजारा .
जो भी उठाएगा सर , जाएगा वो जहन्नुम ,
आख़िर बजेगा हरसू , इस्लाम का नगारा .
ये ओम - क्रॉस क्या हैं ? सबको हटा-मिटा कर ,
चमकाएँगे फ़लक पर , हम अपना चाँदतारा .
है कुफ़्र जिक्रे - काशी , कैलासो - गंगा - जमना ,
हैं पाक सिर्फ जमजम , काबा , बलख , बुखारा .
मिस्मार कर दो मंदिर , बुत तोड़ डालो सारे ,
मुसलिम का काफ़िरों पर , हर वार हो करारा .
जितने जहाँ है खँडहर , वीरानियाँ जहाँ हैं ,
सारी तबाहियों पर , है दस्तख़त हमारा .
कहते किसे मुहब्बत ? इंसानियत क्या शै' है ?
मोमिन नहीं जो उससे , कब कैसा भाईचारा ?
मजहब हमें सिखाता , गैरों से बैर रखना ,
शरियत को काफ़िरों का , जीना नहीं गवारा .
समझो तो वक़्त रहते , इस सच को तुम समझ लो ,
वरना पड़ेगा सर पे , जेहाद का दुधारा .

आचार्य स्वामी श्री धर्मेंद्र महाराज

Monday, 11 March 2013

भले ही मुल्क के हालात में तब्दीलियाँ कम हों,
किसी सूरत गरीबों की मगर अब सिसकियाँ कम हों।

तरक्की ठीक है इसका ये मतलब तो नहीं लेकिन,
धुआँ हो, चिमनियाँ हों, फूल कम हों, तितलियाँ कम हों।

फिसलते ही फिसलते आ गए नाज़ुक मुहाने तक,
ज़रूरी है कि अब आगे से हमसे गल्तियाँ कम हों।

यही जो बेटियाँ हैं ये ही आख़िर कल की माँए हैं,
मिलें मुश्किल से कल माँए न इतनी बेटियाँ कम हों।

दिलों को भी तो अपना काम करने का मिले मौक़ा,
दिमागों ने जो पैदा की है शायद दूरियाँ कम हों।

अगर सचमुच तू दाता है कभी ऐसा भी कर ईश्वर,
तेरी खैरात ज्यादा हो हमारी झोलियाँ कम हों।

Guru Deep
सैयाँ गइलन बिदेस
पहुंचा के सजनी के मन के ठेस

टूटल-फूटल इंग्लिस सीख के,
फोनवा पर झाड़स उपदेश

सूट-बूट आ जूता पहिरस,
रहलन गाँव के गोबर-गनेस

फगुवा फेरु आ गईल,
जोगीरा जहजिया कब लौटी आपन देस ||

जोगीरा सा रा रा रा


सयान बेटवा के मति भईल भ्रष्ट,
घरे मचावे उत्पात
इज्जत माटी में मिला गईल,
सुने ना बडन के बात
उल्टा-सीधा सवाल करे,
समझे अपना के बाप
फगुवा फेरु आ गईल,
जोगीरा भंगवा से होखी इलाज ||
जोगीरा सा रा रा रा,

फागुन महिनवा आ गईल,
सबुनवा लगावे न कोय
रंग के ऊपर रंग चढ़े,
अंग-अंग संग भिगोय
फगुवा फेरु आ गईल,
जोगीरा लगे जैसे जंग होय ||
जोगीरा सा रा रा रा, कबीरा आ रा रा रा.....

पूस-अघन ना हम देखनी,
ना कवनो कार्तिक-कुआर
साल भर में जमा कईनी,
दुसमन दस हजार
कहीं बोली चले कहीं गोली,
सबके लगे हथियार
फगुवा फेरु आ गईल,
जोगीरा दुश्मनो लागे जैसन यार ||
जोगीरा सा रा रा रा
~~@vadhesh~~

Tuesday, 5 March 2013

अशार

गिरे हैं अर्श से फर्श पर ऐसे 
पता नहीं चला ऐसा हुआ कैसे 

आंखी 

Friday, 8 February 2013

मौन के कंठ से


गीत गाता हूँ मै मौन के कंठ से,
है ये कोशिश की तुम याद आना नहीं,

दर्द के ईंट से प्रेम का घर बना,
यह मेरा घर है कोई ठिकाना नहीं।

रिश्ते है दाम के,लोग है नाम के,
अब हँसी की भी कीमत चुकाते है हम।

जानते है कि तुमसे बहुत दुर है,
पर तुम्ही को सुनाने को गाते है हम।

आना सब छोड़ कर,हर कसम तोड़ कर,
अब जो आना तो फिर कभी जाना नहीं।

..............सत्यम शिवम।