Sunday, 23 February 2014

पंजाबी छन्द १

वेख फरीदा मिटटी खुल्ली,मिटटी उत्ते मिटटी धुल्ली
मिटटी हँसे मिटटी रोवे,अंत मिटटी दा मिटटी होवे
ना कर बन्देया मेरी मेरी,ना ए तेरी ना ए मेरी
चार दिन दा मेला दुनिया, फेर मिटटी ते मिटटी दी ढेरी

~बाबा फरीद

चढ़दे सूरज ढल्दे वेखे, बुझे दिवे बल्दे वेखे
हीरे दा कोई मुल ना तारे, खोटे सिक्के चलदे वेखे
जीना दा ना जग ते कोई, ओ वि पुत्रर पलदे वेखे
ओहदी रहमत दे नाल , बन्दे पानी उत्ते चलदे वेखे
लोकी कहेंदे दाल ना गल्दी,मै ते पत्थर गल्दे वेखे

~ बुल्ले शाह जी.

Saturday, 22 February 2014

देश क्या है ????

बलात्कार से सहमी लड़कियों की चीख़ है?
मंदिर, मस्ज़िद, गुरूद्वारे में बँट रही भीख़ है?
लद्दाख में ठिठुरता जवान है, या,
कश्मीर मांगता हुआ हिन्दू - मुस्लमान है?

सिनेमा में तालियां बजाने वाली मासूमियत है?
किताबों में बेची गई झूठी हक़ीक़त है?
जन गण मन पर झूमता हुआ जन समूह है, या,
व्यवस्था में कुचली गयी बेबस रूह है?

Train में मूँगफली फेंककर
अमरीका की सफ़ाई पर चर्चा करना देश है?
सब कुछ देखकर आँखें बंद कर लेना देश है?
अपने परिवार का पेट पालना देश है, या,
देश पर बैठकर घंटो विचार करना देश है?

देश तुम हो, देश मैं हूँ, देश हम हैं
देश परिभाषाओं की जागीर नहीं,
देश इंसानियत सँभालने का ढाँचा है
देश तुम हो, देश मैं हूँ, देश हम हैं

अज्ञात