Friday, 31 May 2013

कुछ रिश्तें बहुत ख़ास होते है, रिश्तों के तथा-कथित सारे बंधनों से आज़ाद और बे-परवाह पर उन रिश्तों को किसी नाम-परिधि में रखना मुश्किल होता है लेकिन वही रिश्ते सबसे ज्यादा अजीज होतें है . यही अनाम रिश्ते किसी का व्यक्तिगत बेशकीमती सरमाया भी होता है और पूरी जिन्दगी का हासिल भी !

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             रिश्ते

रिश्ते ही रिश्ते,रिश्ते ही रिश्ते 
रिश्ते दर रिश्ते दर रिश्ते दर रिश्ते 
सुखों के रिश्ते, दुःखों के रिश्ते
हंसने के रिश्ते, रुलाने के रिश्ते 
पाने के रिश्ते, गंवाने के रिश्ते 
देने के रिश्ते, लेने के रिश्ते
सहने के रिश्ते, कहने के रिश्ते 
आरज़ू के रिश्ते, स्वभाव के रिश्ते 
ख्वाब के रिश्ते, रात के रिश्ते 
हिज्र के रिश्ते, वस्ल के रिश्ते
विरह के रिश्ते, सब्र के रिश्ते 
प्यार के रिश्ते, प्यास के रिश्ते 
पैसे के रिश्ते, जाने कैसे-कैसे रिश्ते
जन्म से ले कर मौत तक रिश्ते 
रिश्ते ही रिश्ते,रिश्ते ही रिश्ते 
रिश्ते दर रिश्ते दर रिश्ते दर रिश्ते 

तो भी मन का हंस अकेला !
- अमर

Thursday, 9 May 2013

जेहाद का दुधारा


सारी तबाहियों पर , है दस्तख़त हमारा ! "
सारे जहाँ से ऊपर , इस्लाम है हमारा .
दुनिया पे राज करना , ये काम है हमारा .
हम को नबी ने बख़्शी , इस्लाम से मुहब्बत ,
बाक़ी सभी से नफरत , ये फ़र्ज़ है हमारा .
क्या चीज़ हुब्बे वतनी? क्या है वतन परस्ती ?
मजहब सिवा किसी से , क्या वास्ता हमारा ?
जेहाद, जंगोदहशत , बारूद औ' धमाके ,
अल्लाह देख खुश है , ऊपर से ये नजारा .
या तो कबूल करले , इस्लाम सारी दुनिया ,
या ख़ाक कर दो इसको , ये है नबी का नारा .
हर शै' पे काफिरों की , हम मोमिनों का हक है ,
जोरू, जमीन, जेवर , हर माल है हमारा .
रहना जिसे सलामत , सुन्नत कबूल कर ले ,
इसके सिवा किसी का , हरगिज़ नहीं गुजारा .
जो भी उठाएगा सर , जाएगा वो जहन्नुम ,
आख़िर बजेगा हरसू , इस्लाम का नगारा .
ये ओम - क्रॉस क्या हैं ? सबको हटा-मिटा कर ,
चमकाएँगे फ़लक पर , हम अपना चाँदतारा .
है कुफ़्र जिक्रे - काशी , कैलासो - गंगा - जमना ,
हैं पाक सिर्फ जमजम , काबा , बलख , बुखारा .
मिस्मार कर दो मंदिर , बुत तोड़ डालो सारे ,
मुसलिम का काफ़िरों पर , हर वार हो करारा .
जितने जहाँ है खँडहर , वीरानियाँ जहाँ हैं ,
सारी तबाहियों पर , है दस्तख़त हमारा .
कहते किसे मुहब्बत ? इंसानियत क्या शै' है ?
मोमिन नहीं जो उससे , कब कैसा भाईचारा ?
मजहब हमें सिखाता , गैरों से बैर रखना ,
शरियत को काफ़िरों का , जीना नहीं गवारा .
समझो तो वक़्त रहते , इस सच को तुम समझ लो ,
वरना पड़ेगा सर पे , जेहाद का दुधारा .

आचार्य स्वामी श्री धर्मेंद्र महाराज