क्या होगा भईया मेरे देश का हाल !!
राजनीति हो गई वेश्या नेता बने दलाल,
ऐसे में क्या होगा भईया मेरे देश का हाल !
राजनीति हो गई वेश्या नेता बने दलाल,
ऐसे में क्या होगा भईया मेरे देश का हाल !
संसद को एक पलंग समझकर उस पर शयन किया
संविधान को मान के चादर खिंचा ओढ़ लिया
आज तिरंगे को लोगों ने बना लिया रुमाल
ऐसे में क्या होगा भईया मेरे देश का हाल !
बलात्कार जो आज हो रहा लोकतंत्र के साथ
सत्ता में हो या विपक्ष में सबका इसमें हाथ
किसी को भारत-माता की इज्ज़त का नहीं ख्याल
ऐसे में क्या होगा भईया मेरे देश का हाल !
अभी इधर कश्मीर सुलगता और उधर आसाम
प्रशासन के घोड़े की है टूटी हुई लगाम
कहीं पे सरपट भाग रहा है कहीं पे धीमी चाल
ऐसे में क्या होगा भईया मेरे देश का हाल !
जय जवान और जय किसान के नारे रोज़ लगे
लेकिन हर मजदूर किसान ही जाते रोज़ ठगे
अन्नदाता कहते हैं जिसको आज वही कंगाल
ऐसे में क्या होगा भईया मेरे देश का हाल !
डिप्लोमा की नहीं जरुरत डिग्री का क्या काम
की जाती है अब सिक्कों में नौकरियां नीलाम
फैला रखा है लोक सेवा आयोग ने अपना जाल
ऐसे में क्या होगा भईया मेरे देश का हाल !
कसाई जैसे दिखते हैं कुछ बड़े-बड़े अफसर
बूचड़खाने बने हुए हैं सरकारी दफ्तर
तेज़ छूरी से जहाँ हो रही जनता रोज़ हलाल
ऐसे में क्या होगा भईया मेरे देश का हाल !
अर्थव्यवस्था को क्यूँ आती नहीं जरा भी लाज
महंगाई क्यूँ नंगी होकर नाच रही आज
स्वदेशी तबले पे विदेशी पूंजी देती ताल
ऐसे में क्या होगा भईया मेरे देश का हाल !
(मुकीम भारती)
संविधान को मान के चादर खिंचा ओढ़ लिया
आज तिरंगे को लोगों ने बना लिया रुमाल
ऐसे में क्या होगा भईया मेरे देश का हाल !
बलात्कार जो आज हो रहा लोकतंत्र के साथ
सत्ता में हो या विपक्ष में सबका इसमें हाथ
किसी को भारत-माता की इज्ज़त का नहीं ख्याल
ऐसे में क्या होगा भईया मेरे देश का हाल !
अभी इधर कश्मीर सुलगता और उधर आसाम
प्रशासन के घोड़े की है टूटी हुई लगाम
कहीं पे सरपट भाग रहा है कहीं पे धीमी चाल
ऐसे में क्या होगा भईया मेरे देश का हाल !
जय जवान और जय किसान के नारे रोज़ लगे
लेकिन हर मजदूर किसान ही जाते रोज़ ठगे
अन्नदाता कहते हैं जिसको आज वही कंगाल
ऐसे में क्या होगा भईया मेरे देश का हाल !
डिप्लोमा की नहीं जरुरत डिग्री का क्या काम
की जाती है अब सिक्कों में नौकरियां नीलाम
फैला रखा है लोक सेवा आयोग ने अपना जाल
ऐसे में क्या होगा भईया मेरे देश का हाल !
कसाई जैसे दिखते हैं कुछ बड़े-बड़े अफसर
बूचड़खाने बने हुए हैं सरकारी दफ्तर
तेज़ छूरी से जहाँ हो रही जनता रोज़ हलाल
ऐसे में क्या होगा भईया मेरे देश का हाल !
अर्थव्यवस्था को क्यूँ आती नहीं जरा भी लाज
महंगाई क्यूँ नंगी होकर नाच रही आज
स्वदेशी तबले पे विदेशी पूंजी देती ताल
ऐसे में क्या होगा भईया मेरे देश का हाल !
(मुकीम भारती)